चंडीगढ़ 25 जनवरी 2026( जगदीश कुमार) चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस सब-इंस्पैक्टर भर्ती से जुड़े एक विवाद में सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर-कुंजी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस जगमोहन बंसल की एकलपीठ ने साफ कहा कि जब चयन आयोग ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर उत्तर-कुंजी तय की हो और उसमें कोई स्पष्ट त्रुटि साबित न हो, तो अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।यह मामला विज्ञापन संख्या 3/2021 के तहत हुई सब-इंस्पैक्टर भर्ती परीक्षा
से जुड़ा है। याची अमित ने परीक्षा के तीन प्रश्नों की उत्तर-कुंजी को गलत बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। भर्ती प्रक्रिया में लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षण, शारीरिक माप और दस्तावेज सत्यापन शामिल थे। मेरिट सूची लिखित अंकों, अतिरिक्त योग्यता और सामाजिक-आर्थिक मानदंडों के आधार पर तैयार की गई थी।अमित ने 26 सितंबर 2021 को हुई लिखित परीक्षा में हिस्सा लिया था। उस समय जारी प्रोविजनल आंसर-की पर आपत्तियां मांगी गई थीं, लेकिन उसने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। बाद में वह चयनित भी हो गया और उसके कुल 67.20 अंक बने, जिनमें 5 अंक सामाजिक-आर्थिक श्रेणी के थे।हालांकि, दस्तावेजों की जांच के दौरान खुलासा हुआ कि अमित के पिता दिल्ली पुलिस में कार्यरत हैं। इसके बावजूद अमित ने शपथ-पत्र देकर यह दावा किया था कि उसके परिवार में कोई भी सरकारी कर्मचारी नहीं है। इसे गलत पाए जाने पर उसके 5 सामाजिक-आर्थिक अंक काट दिए गए, जिससे वह कट-ऑफ से नीचे चला गया और चयन से बाहर हो गया।इसके बाद अमित ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तीन सवालों की उत्तर-कुंजी को चुनौती दी —
हरियाणा के पूर्व डीजीपी की मृत्यु से संबंधित प्रश्न गेहूं बोने के उपयुक्त तापमान का प्रश्न अनुच्छेद 370 हटाने की तिथि से जुड़ा प्रश्न कोर्ट ने पहले प्रश्न में आयोग के उत्तर को सही ठहराया। दूसरे प्रश्न को तकनीकी विषय बताते हुए कहा कि इसमें विशेषज्ञों की राय में दखल नहीं दिया जा सकता। तीसरे प्रश्न पर कोर्ट ने कहा कि संसद ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने का प्रस्ताव पारित किया था, जबकि राष्ट्रपति की अधिसूचना 6 अगस्त को जारी हुई थी, इसलिए 5 अगस्त को ही सही तिथि माना जाएगा।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि उत्तर-कुंजी में बदलाव केवल तभी किया जा सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से गलत साबित हो। इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। साथ ही, याची द्वारा गलत सामाजिक-आर्थिक लाभ लेने को गंभीर मानते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी।

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