चंडीगढ़ 26 जनवरी 2026(दैनिक खबरनामा) चंडीगढ़ के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट नंबर 250/2023 ने पीजीआई में टैक्स प्रबंधन को लेकर चौंकाने वाली लापरवाही उजागर की है। रिपोर्ट के अनुसार, पीजीआई द्वारा जीएसटी नियमों का पालन सुनिश्चित न किए जाने के कारण सरकारी खजाने को सीधे तौर पर 8.06 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। यह मामला जुलाई 2017 से जून 2020 के बीच सुरक्षा सेवाओं के लिए किए गए एक निजी एजेंसी के साथ अनुबंध से जुड़ा हुआ है।कैग रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई 2017 में पीजीआई ने एक निजी सुरक्षा एजेंसी से सेवाएं लेने के लिए करार किया था। अनुबंध की शर्तें स्पष्ट थीं कि सेवा शुल्क में सभी कर शामिल होंगे और संबंधित एजेंसी को जीएसटी कानूनों का पूर्ण पालन करना अनिवार्य होगा। इसके बावजूद, जांच में सामने आया कि एजेंसी ने कई महीनों तक अपने बिलों में जीएसटी न तो अलग से दर्शाया और न ही उसे सरकारी खाते में जमा कराया।सबसे गंभीर पहलू यह रहा कि इन खामियों के बावजूद पीजीआई ने नवंबर 2017 से जून 2020 तक एजेंसी को लगातार भुगतान करता रहा। भुगतान से पहले न तो वैध जीएसटी चालान की मांग की गई और न ही टैक्स इनवॉयस की कोई ठोस जांच की गई। कैग के अनुसार, यह प्रक्रिया वित्तीय अनुशासन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ थी।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मार्च 2020 में पीजीआई ने एजेंसी को जीएसटी चालान जमा करने के निर्देश तो जारी किए, लेकिन इसके बाद भी नियमों का सख्ती से पालन नहीं कराया गया। कई मामलों में जीएसटी जोड़ा ही नहीं गया, और जहां जोड़ा गया, वहां भी उसका भुगतान सरकार को नहीं किया गया। इसका सीधा असर सरकारी राजस्व पर पड़ा और करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।कैग की सख्त टिप्पणी
कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि भले ही जीएसटी इनवॉयस जारी करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सेवा प्रदाता की होती है, लेकिन सेवा प्राप्तकर्ता होने के नाते पीजीआई की भी यह जिम्मेदारी थी कि वह भुगतान से पहले नियमों का पालन सुनिश्चित करे। बिना वैध टैक्स इनवॉयस और जीएसटी जमा होने के प्रमाण के भुगतान जारी करना गंभीर वित्तीय लापरवाही की श्रेणी में आता है।कैग ने यह भी कहा है कि यदि पीजीआई ने समय रहते जीएसटी नियमों का पालन करवाया होता और भुगतान से पहले आवश्यक दस्तावेजों की समुचित जांच की होती, तो 8.06 करोड़ रुपये के नुकसान से सरकारी खजाने को बचाया जा सकता था। रिपोर्ट सामने आने के बाद पीजीआई की वित्तीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग तेज हो गई है।