अयोध्या 27 दिसम्बर (जगदीश कुमार)अयोध्या में निर्मित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल एक भव्य धार्मिक भवन नहीं है, बल्कि यह भारत की हजारों वर्ष पुरानी स्थापत्य परंपरा, शिल्पशास्त्र और वैदिक विज्ञान का सजीव प्रमाण है। यह मंदिर आस्था और विज्ञान के उस अद्भुत संगम को दर्शाता है, जिसमें मानव कौशल और प्रकृति के नियम एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं। रामलला का यह धाम आने वाली कई सदियों तक अडिग बना रहे, इसके लिए इसमें आधुनिक कंक्रीट या लोहे पर आधारित तकनीक से अधिक प्राचीन शास्त्रीय ज्ञान का सहारा लिया गया है।मंदिर का निर्माण उन सिद्धांतों पर किया गया है, जिनका उल्लेख भारतीय वास्तु और शिल्प ग्रंथों में मिलता है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर बनाई गई इसकी संरचना इस तरह डिजाइन की गई है कि समय, मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव इसे कमजोर न कर सके। मंदिर में प्रयुक्त प्रत्येक पत्थर को विशेष विधि से तराशा गया है, ताकि वह बिना किसी धातु की मदद के आपस में मजबूती से जुड़ सके। यही कारण है कि श्रीराम मंदिर को हजारों वर्षों तक टिकने वाली संरचना के रूप में देखा जा रहा है।राम मंदिर का हर स्तंभ, हर दीवार और हर नक्काशी केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं है, बल्कि उसके पीछे गहरी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सोच छिपी हुई है। स्तंभों की ऊंचाई, उनकी मोटाई और उनके बीच की दूरी तक शास्त्रीय नियमों के अनुसार तय की गई है, ताकि भार समान रूप से वितरित हो सके। नक्काशियों में भी ऐसी ज्यामितीय संतुलन दिखाई देता है, जो मंदिर की मजबूती को बढ़ाता है और उसे समय की मार से बचाता है।यह मंदिर इस बात का उदाहरण है कि भारत में आस्था कभी केवल भावना तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने हमेशा ज्ञान और विज्ञान का सहारा लिया है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आने वाली पीढ़ियों के लिए न सिर्फ एक धार्मिक स्थल होगा, बल्कि यह उन्हें यह भी बताएगा कि प्राचीन भारत में किस तरह बिना आधुनिक संसाधनों के ऐसी अद्भुत और दीर्घकालिक संरचनाएं खड़ी की जाती थीं। यही वजह है कि अयोध्या का राम मंदिर आज आस्था के साथ-साथ भारतीय विरासत और वैज्ञानिक सोच का भी प्रतीक बन चुका है।
