गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से समझौता नहीं होगा; अदालत ने पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कीं, हाई कोर्टों को भी फैसलों में देरी न करने के निर्देश
दैनिक खबरनामा | नई दिल्ली, 30 मई : सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी शिक्षकों की पात्रता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना आवश्यक होगा। हालांकि अदालत ने विभिन्न राज्यों और शिक्षकों के समक्ष मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों को देखते हुए परीक्षा पास करने की समयसीमा बढ़ा दी है। अब संबंधित शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी उत्तीर्ण करनी होगी।
शीर्ष अदालत की पीठ ने इस मामले में दायर कई पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि निर्धारित नई समयसीमा के बाद किसी प्रकार की अतिरिक्त छूट या विस्तार नहीं दिया जाएगा।
शिक्षा की गुणवत्ता सर्वोच्च प्राथमिकता
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि टीईटी केवल एक औपचारिक परीक्षा नहीं है, बल्कि यह प्राथमिक स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। न्यायालय के अनुसार, बच्चों को सक्षम और प्रशिक्षित शिक्षकों द्वारा शिक्षा मिलना उनका अधिकार है और इस अधिकार से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना कानून का पूर्वव्यापी उपयोग है। अदालत ने कहा कि शिक्षा संबंधी कानूनों में पहले से यह व्यवस्था मौजूद है कि सेवा में कार्यरत शिक्षक भी निर्धारित अवधि में आवश्यक योग्यता हासिल करेंगे।
नौकरी जाने की आशंका पर भी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई थी कि टीईटी अनिवार्य होने से बड़ी संख्या में शिक्षकों की नौकरी प्रभावित हो सकती है। इस पर अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर आवश्यक शैक्षणिक मानकों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिना निर्धारित योग्यता वाले शिक्षकों को लंबे समय तक सेवा में बनाए रखना विद्यार्थियों के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
हाई कोर्टों को भी दिए महत्वपूर्ण निर्देश
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाई कोर्टों को मामलों के निपटारे में अनावश्यक देरी से बचने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि सुनवाई पूरी होने के बाद सामान्यतः तीन महीने के भीतर फैसला सुना दिया जाना चाहिए।
न्यायालय ने विशेष रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जमानत से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में संभव हो तो उसी दिन या अगले दिन फैसला सुनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्यवस्था दी कि यदि किसी मामले में सुनवाई पूरी होने के चार महीने बाद भी निर्णय नहीं आता है, तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों फैसले शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता सुनिश्चित करने और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।