दैनिक खबरनामा। श्रीनगर, 27 अक्टूबर: कश्मीर में स्तन कैंसर महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है। चिंताजनक बात यह है कि यहां करीब 70 से 73 फीसदी मरीजों में इस बीमारी का पता तीसरी स्टेज में चल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान हो जाए तो इलाज के सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। ऐसे में लक्षणों को पहचानना, समय पर जांच करवाना और इलाज शुरू करना बेहद जरूरी है।
न्यू सिटी अस्पताल, टेंगपोरा बाईपास की सर्जिकल ऑन्कोलॉजी निदेशक डॉ. शबनम बशीर के अनुसार, जागरूकता और वक्त पर डॉक्टरी सलाह से बीमारी के असर को कम किया जा सकता है।
स्तन कैंसर तब होता है जब स्तन की कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं। यह आम तौर पर दूध की नलियों या ग्रंथियों से शुरू होता है। महिलाओं में यह ज्यादा देखा जाता है, लेकिन पुरुष भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
गांठ को अनदेखा करना पड़ सकता है भारी
स्तन या बगल में नई गांठ बनना, स्तन के आकार में बदलाव आना, त्वचा पर गड्ढे पड़ना या लालिमा आना, निप्पल का अंदर की ओर धंसना और उससे असामान्य, खासतौर पर खून मिला हुआ डिस्चार्ज होना स्तन कैंसर के मुख्य लक्षण हो सकते हैं।
ऐसा घाव जो ठीक न हो रहा हो या बगल और कॉलरबोन के आसपास सूजन भी जांच की वजह बन सकती है। हर गांठ कैंसर नहीं होती, लेकिन किसी नए या लगातार बने रहने वाले बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गांठ में दर्द न होना भी इस बात की गारंटी नहीं है कि वह खतरनाक नहीं है।
उम्र, पारिवारिक इतिहास और लाइफस्टाइल भी बढ़ाते हैं खतरा
भारत में महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे आम कैंसर है। जानकारी की कमी, जांच का डर, सामाजिक झिझक और लक्षणों को छिपाने की प्रवृत्ति की वजह से कई महिलाएं देर से अस्पताल पहुंचती हैं। कश्मीर के दूरदराज के इलाकों में सफर का खर्च, भौगोलिक दिक्कतें और विशेषज्ञ सेवाओं तक सीमित पहुंच भी इलाज में देरी की वजह बन सकती है।
उम्र बढ़ने के साथ जोखिम बढ़ता है। परिवार में स्तन या अंडाशय के कैंसर का इतिहास, बीआरसीए-1 और बीआरसीए-2 जैसे जेनेटिक बदलाव, घने स्तन ऊतक और छाती पर पहले रेडिएशन होना भी खतरा बढ़ाते हैं। कम उम्र में पीरियड्स शुरू होना, देर से पहला बच्चा होना, कम बच्चे होना और देर से मेनोपॉज आना भी कुछ मामलों में जोखिम को प्रभावित करता है।
मेनोपॉज के बाद मोटापा, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, शराब और कुछ तरह की हार्मोन थेरेपी भी जोखिम से जुड़ी हैं। हालांकि बिना किसी स्पष्ट रिस्क फैक्टर के भी कैंसर हो सकता है।
समय पर जांच और इलाज है जरूरी
डॉ. शबनम ने हेल्दी वजन बनाए रखने, संतुलित भोजन लेने और हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट मीडियम लेवल की फिजिकल एक्टिविटी करने की सलाह दी। फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें खाने में शामिल करना और तंबाकू से बचना भी अहम है।
महिलाओं को अपने स्तनों के सामान्य आकार और बनावट के बारे में पता होना चाहिए, ताकि असामान्य बदलाव को जल्द पहचाना जा सके। डॉक्टरी जांच और मैमोग्राफी की जरूरत उम्र, व्यक्तिगत जोखिम और मेडिकल गाइडलाइंस के हिसाब से तय होती है। परिवार में कैंसर का मजबूत इतिहास होने पर डॉक्टर से व्यक्तिगत जांच प्लान और जेनेटिक काउंसलिंग लेनी चाहिए।
संदिग्ध बदलाव मिलने पर डॉक्टरी जांच के बाद जरूरत के मुताबिक अल्ट्रासाउंड, मैमोग्राफी और बायोप्सी की जाती है। मरीज की स्थिति के आधार पर सर्जरी, रेडिएशन, कीमोथेरेपी, हार्मोन थेरेपी या टारगेटेड दवाओं से इलाज किया जा सकता है। पोषण संबंधी मदद, फिजियोथेरेपी, रिहैब और मनोवैज्ञानिक परामर्श भी इलाज का अहम हिस्सा हैं।
उपलब्ध सुविधाओं का उठाएं लाभ
डॉ. बशीर के मुताबिक कश्मीर में जांच और इलाज की सुविधाएं मौजूद हैं, जिनकी मदद से मरीज अपने क्षेत्र में ही पूरा इलाज ले सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता अभियान के साथ जांच केंद्रों तक आसान पहुंच और मरीजों को समय पर विशेषज्ञों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी जरूरी है। डर या सामाजिक झिझक के कारण जांच टालने के बजाय डॉक्टर से समय पर सलाह लेना ही स्तन कैंसर से लड़ने की दिशा में सबसे जरूरी कदम है।