नई दिल्ली 5 जनवरी( दैनिक खबरनामा)सुप्रीम कोर्ट ने अडानी पावर लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट के वर्ष 2019 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कंपनी को गुजरात के विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) से घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) में भेजी गई बिजली पर कस्टम ड्यूटी से छूट देने से इनकार किया गया था।यह मामला मुंद्रा पोर्ट स्थित अडानी पावर के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से जुड़ा है, जहां से उत्पादित बिजली SEZ से DTA में आपूर्ति की जाती है। वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने बिजली पर 26 जून 2009 से पिछली तारीख से कस्टम ड्यूटी लगाने का प्रावधान किया था, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने 2015 में मनमाना और अवैध करार दिया था।2015 के फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि कस्टम ड्यूटी केवल वैध चार्जिंग प्रावधान के तहत ही लगाई जा सकती है और बिजली पर ऐसी ड्यूटी पूर्व प्रभाव से नहीं लगाई जा सकती। साथ ही इसे दोहरा कर (डबल टैक्सेशन) भी माना गया था, क्योंकि कंपनी पहले ही कच्चे माल पर ड्यूटी चुका चुकी थी।इसके बावजूद अधिकारियों ने बाद की अवधि के लिए फिर से कस्टम ड्यूटी लगाई, जिसे लेकर अडानी पावर ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया। 2019 में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि कंपनी ने नई अधिसूचनाओं को अलग से चुनौती नहीं दी है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि 2015 का गुजरात हाईकोर्ट का फैसला कानून की स्पष्ट घोषणा था और वह केवल एक सीमित अवधि या अधिसूचना तक सीमित नहीं था। कोर्ट ने माना कि बाद की अधिसूचनाओं में केवल ड्यूटी की दर बदली गई थी, कोई नया कर या वैध चार्जिंग प्रावधान नहीं बनाया गया था।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 2019 में हाईकोर्ट की समन्वय पीठ (को-ऑर्डिनेट बेंच) 2015 के फैसले का पालन करने के लिए बाध्य थी। यदि उसे उस फैसले पर संदेह था, तो उसे मामले को बड़ी पीठ को भेजना चाहिए था, न कि पहले के फैसले की सीमा को संकुचित करना।रिफंड का आदेश अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई कर कानून के अधिकार के बिना वसूला गया हो, तो राज्य उसे अपने पास नहीं रख सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के 2019 के आदेश को रद्द करते हुए कस्टम विभाग को निर्देश दिया कि वह सत्यापन के बाद आठ सप्ताह के भीतर अडानी पावर को वसूली गई राशि का रिफंड करे।यह फैसला SEZ से DTA में बिजली आपूर्ति से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी मिसाल माना जा रहा है।