दैनिक खबरनामा 15 अप्रैल 2026 चंडीगढ़ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी पति सिर्फ इस आधार पर अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता कि वह छात्र है या आर्थिक रूप से कमजोर है। अदालत ने कहा कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम है और कमाने की क्षमता रखता है, तो पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाना उसका कानूनी दायित्व है।यह टिप्पणी न्यायमूर्ति शालिनी सिंह नागपाल की एकल पीठ ने एक 22 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग छात्र की याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने फरीदाबाद की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 2500 रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए गए थे।मामले के अनुसार, दोनों की शादी जून 2020 में हुई थी। बाद में पति ने वर्ष 2023 में विवाह निरस्तीकरण की याचिका दायर की, जिसके बाद पत्नी ने धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग की।अदालत में पति ने दलील दी कि वह छात्र है और उसकी मां की 3000 रुपये की विधवा पेंशन पर पूरा परिवार निर्भर है। साथ ही उसने कहा कि पत्नी अपने मायके में रह रही है, जहां उसके भाई कमाने वाले हैं, इसलिए उसे गुजारा भत्ता देने की आवश्यकता नहीं है।हालांकि, हाई कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता का उद्देश्य पति को दंडित करना नहीं, बल्कि पत्नी को आर्थिक तंगी और असुरक्षा से बचाना है। अदालत ने कहा कि “आय नहीं होने” का तर्क केवल एक बहाना है, जिसे कानून में स्वीकार नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति के लिए कमाई करना संभव है। अदालत ने कहा कि एक दिहाड़ी मजदूर भी आसानी से 12-13 हजार रुपये मासिक कमा सकता है। ऐसे में 2500 रुपये प्रति माह की राशि को कम नहीं किया जा सकता, खासकर महंगाई के इस दौर में जब यह रकम भी बुनियादी जरूरतों के लिए मुश्किल से पर्याप्त है।
अंततः हाई कोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और साफ संदेश दिया कि वैवाहिक जिम्मेदारियों से कोई भी व्यक्ति बच नहीं सकता।