दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 6 जून 2026: महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल के भुगतान को लेकर शुरू हुआ विवाद करीब 19 वर्षों तक अदालतों में चलता रहा। आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद का पटाक्षेप कर दिया।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो, तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। यह फैसला न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया।
टीए बिलों का भुगतान न होने से शुरू हुआ विवाद
मामले की शुरुआत रोहतक निवासी ओ.पी. खन्ना द्वारा दायर दीवानी मुकदमे से हुई। खन्ना का आरोप था कि दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित उनके 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान विभाग द्वारा बिना उचित कारण के रोक दिया गया। उन्होंने मूल राशि के साथ ब्याज की भी मांग की थी।
वहीं, हरियाणा सरकार ने अदालत में दलील दी कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता और स्थानीय यात्रा भत्ता व किलोमीटर दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग का कहना था कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण के लिए भेजा गया था और कर्मचारी को आपत्तियों की जानकारी भी दे दी गई थी।
निचली अदालत से हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओ.पी. खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की।
प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय सुनाया। इस आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल की।
धारा 102 के तहत अपील सुनवाई योग्य नहीं
सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 के अनुसार 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील दायर नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है।
छोटी राशि के मामलों में लंबी मुकदमेबाजी पर कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी जारी रखने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि कई बार विवादित राशि से कई गुना अधिक सार्वजनिक धन मुकदमेबाजी पर खर्च कर दिया जाता है, जिससे न केवल सरकारी संसाधनों की बर्बादी होती है बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी प्रभावित होता है।
न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट प्रावधानों के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील खारिज कर दी गई।