चंडीगढ 30 दिसम्बर (जगदीश कुमार)पंजाब में घरेलू ऊर्जा की तस्वीर तेजी से बदल रही है। केंद्र सरकार जहां रसोई गैस को स्वच्छ और सुरक्षित ईंधन के रूप में बढ़ावा दे रही है, वहीं आम उपभोक्ता अपनी जेब के दबाव में बिजली जैसे अपेक्षाकृत सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर रहा है। ताजा सरकारी आंकड़े इस बदलाव की पुष्टि करते हैं और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
सरकार की मंशा रही है कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिले और उनकी रसोई में एलपीजी गैस पहुंचे। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की गई थी। योजना के तहत लाखों परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए, लेकिन अब चुनौती कनेक्शन से आगे की है—यानी नियमित रिफिल।आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन रखने वाले कई परिवार साल में एक या दो बार ही सिलेंडर भरवा पा रहे हैं। गैस सिलेंडर की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सीमित आय के कारण रसोई का मासिक बजट बिगड़ रहा है। ऐसे में उपभोक्ता मजबूरी में बिजली से चलने वाले इंडक्शन चूल्हे या अन्य विकल्पों को अपनाने लगे हैं, जो शुरुआती निवेश के बाद अपेक्षाकृत सस्ते पड़ते हैं।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। कई परिवारों का कहना है कि गैस सिलेंडर भरवाना उनके लिए प्राथमिकता नहीं रह गया है। जब घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य जैसी जरूरतें सामने हों, तो रसोई गैस पर खर्च करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि उज्ज्वला योजना की “लौ” कागजों में तो जल रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर वह कमजोर पड़ती दिख रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक गैस को वास्तव में सस्ता और सुलभ नहीं बनाया जाता, तब तक उपभोक्ता स्वच्छ ईंधन की ओर स्थायी रूप से नहीं बढ़ पाएंगे। केवल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है, रिफिल की लागत और सब्सिडी व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
कुल मिलाकर, ताजा सरकारी आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि पंजाब में ऊर्जा की पसंद सरकार की नीतियों से ज्यादा उपभोक्ता की आर्थिक स्थिति से तय हो रही है। जब तक रसोई का खर्च काबू में नहीं आता, तब तक प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।