दैनिक खबरनामा
15 जुलाई नई दिल्ली: यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) की समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
यह रिपोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च 2025 के उस विवादास्पद फैसले के बाद तैयार की गई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना अपने आप में बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगाते हुए न्यायिक अधिकारियों के लिए संवेदनशीलता संबंधी दिशा-निर्देश तैयार करने के निर्देश दिए थे।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने 9 जुलाई को आए पटना हाई कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत से कहा कि इस प्रकार के आदेश समय-समय पर सामने आते रहते हैं। पटना हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना मात्र से बलात्कार के प्रयास का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता।
इस पर जस्टिस वी. मोहना ने पूछा कि क्या पटना हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों पर विचार किया था। वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे कानून में हुए नए विकास और महत्वपूर्ण फैसलों का अध्ययन करें। उन्होंने टिप्पणी की, “जजों को भी रिसर्च करनी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सभी अदालतें न्यायिक हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें। साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया में भी इन दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करे। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में विस्तृत कारणों सहित निर्णय सार्वजनिक किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा है। पीड़िता के अनुसार, वह अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित एक फोटो स्टूडियो गई थी। आरोप है कि फोटो लेने के बाद स्टूडियो संचालक ने उसके पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और युवती को फोटो दिखाने के बहाने अंदर रोक लिया। इसके बाद उसने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर उसके साथ यौन उत्पीड़न करने का प्रयास किया।
पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता मौके पर पहुंच गए, जिसके बाद आरोपी वहां से फरार हो गया। एफआईआर दर्ज होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की बलात्कार के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने से संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया था।
हालांकि, अपील की सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा की। अदालत ने कहा कि बलात्कार के प्रयास के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त मेडिकल साक्ष्य मौजूद नहीं थे। साथ ही जांच अधिकारी की गवाही भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी और अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से पीड़िता तथा उसके माता-पिता के बयानों पर आधारित था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने बलात्कार के प्रयास से संबंधित दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने यह माना कि आरोपी का कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने के अपराध की श्रेणी में आता है।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि स्टूडियो का दरवाजा बंद करना, महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और उसकी छाती दबाना यह दर्शाता है कि आरोपी ने महिला की मर्यादा भंग करने के उद्देश्य से आपराधिक बल का प्रयोग किया। इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर धारा 354 के तहत अपराध सिद्ध होता है, भले ही बलात्कार के प्रयास का आरोप प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद न हों।