दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 10 अगस्त : भारत रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान Su-57 को खरीदने के बजाय भविष्य की छठी पीढ़ी की लड़ाकू विमान तकनीक पर ध्यान केंद्रित करता नजर आ रहा है। भारत की रणनीति में स्वदेशी रक्षा उत्पादन और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तकनीक को प्राथमिकता दी जा रही है।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने हाल ही में स्पष्ट किया कि भारत ने सुखोई के नए संस्करणों पर अभी “विचार नहीं किया है।” इसके बजाय सरकार और भारतीय वायुसेना मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को ‘सुपर सुखोई’ कार्यक्रम के तहत उन्नत करने और स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के विकास पर जोर दे रही हैं।

रूस ने दिया Su-57 का बड़ा प्रस्ताव

रूस की ओर से भारत को Su-57 के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए जाने की खबरें सामने आती रही हैं। इनमें भारत में विमान के स्थानीय उत्पादन, सोर्स कोड उपलब्ध कराने और दो सीटों वाले संस्करण के विकास जैसे विकल्प शामिल हैं। हालांकि, भारत की रक्षा योजना में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने के लक्ष्य के चलते इन प्रस्तावों को प्राथमिकता नहीं मिलती दिख रही है।

चीन के J-20 से बढ़ रही चुनौती

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन की तेजी से बढ़ती पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की क्षमता है। चीन बड़ी संख्या में J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमान अपने बेड़े में शामिल कर रहा है। दूसरी ओर, भारत का AMCA कार्यक्रम अभी विकास के चरण में है और इसके पूरी तरह तैयार होने में समय लग सकता है।

इसी वजह से भारत अब केवल पांचवीं पीढ़ी के विमान हासिल करने के बजाय सीधे छठी पीढ़ी की लड़ाकू विमान तकनीक में भागीदारी के विकल्प तलाश रहा है।

फ्रांस के नेतृत्व वाले कार्यक्रम में शामिल होने की कोशिश

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस के नेतृत्व वाले छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में शामिल होने की दिशा में प्रयास शुरू किए हैं। संसद में पेश रक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी इस दिशा में भारत की रुचि का उल्लेख किया गया है।

रक्षा मंत्रालय ने कथित तौर पर फ्रांस से ऐसे विमानों की संभावित खरीद और कार्यक्रम में भागीदारी को लेकर एक रोडमैप मांगा है।

दो बड़े अंतरराष्ट्रीय समूह विकसित कर रहे छठी पीढ़ी के विमान

रक्षा समिति के अनुसार, दुनिया में छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने के लिए दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समूह काम कर रहे हैं। पहला समूह ब्रिटेन, इटली और जापान के बीच सहयोग पर आधारित है, जबकि दूसरा यूरोपीय समूह फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से जुड़ा रहा है।

भारत की कोशिश है कि वह इनमें से किसी एक समूह के साथ साझेदारी कर अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तकनीक के विकास में अपनी भूमिका सुनिश्चित करे।

आत्मनिर्भरता और भविष्य की तकनीक पर दोहरा फोकस

भारत फिलहाल एक ओर Su-30MKI के सुपर सुखोई अपग्रेड और स्वदेशी AMCA पर ध्यान दे रहा है, वहीं दूसरी ओर छठी पीढ़ी की तकनीक में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के विकल्प तलाश रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय वायुसेना को भविष्य के युद्धक्षेत्र के लिए तैयार करना और चीन के बढ़ते हवाई शक्ति नेटवर्क से पीछे न रहना है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में भारत की लड़ाकू विमान रणनीति का फोकस केवल विदेशी विमान खरीदने के बजाय स्वदेशी विकास, तकनीकी साझेदारी और छठी पीढ़ी की युद्धक क्षमताओं के बीच संतुलन बनाने पर रह सकता है।

Share to :
Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल : आत्मनिर्भर भारत के लिए क्यों साबित हो सकती है बड़ी उपलब्धि

दैनिक खबरनामा।नई दिल्ली, 12 जून — भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम…
Share to :

राफेल एफ 5 को मिलेगा हाइपरसोनिक परमाणु मिसाइल ASN4G, 2035 तक शामिल करने का लक्ष्य

ब्यूरो पेरिस: फ्रांस ने अपने अत्याधुनिक लड़ाकू विमान कार्यक्रम को नई दिशा…
Share to :

चीन सीमा से लेकर नियंत्रण रेखा तक सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़, सैनिकों की तैयारियों का वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने लिया जायजा

दैनिक खबरनामा | जम्मू, 30 मई :  उत्तरी क्षेत्र में तैनात सेना…
Share to :

अगले संघर्ष के लिए तैयार हो रही तीनों सेनाएं, सेना प्रमुख ने दिए बड़े संकेत

दैनिक खबरनामा | नई दिल्ली, 30 मई : देश की सुरक्षा व्यवस्था…
Share to :