दैनिक खबरनामा। शिमला, 10 अगस्त: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि विवाह विच्छेद हो जाने के बाद भी, जब तक पत्नी ने दूसरी शादी नहीं की है, तब तक पूर्व पति को उसे गुजारा भत्ता देना ही पड़ेगा।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने हमीरपुर के पारिवारिक न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली सुरजीत नामक व्यक्ति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला
सुरजीत और सावित्री देवी का विवाह 21 दिसंबर 1997 को हुआ था। सावित्री देवी के अनुसार, वैवाहिक जीवन में उन्हें प्रताड़ित किया गया और 2009 में उन्हें घर से बाहर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हमीरपुर फैमिली कोर्ट में तलाक के साथ-साथ गुजारा भत्ता मांगने की अर्जी लगाई।
22 नवंबर 2021 को कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर दोनों का तलाक मंजूर कर लिया। इसके बाद 23 जनवरी 2024 को फैमिली कोर्ट ने सुरजीत को आदेश दिया कि वह सावित्री देवी को 18.05.2019 से हर महीने 4,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में दें।
हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई
सुरजीत ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसका तर्क था कि तलाक के बाद पति-पत्नी का कानूनी संबंध खत्म हो जाता है, इसलिए अब भत्ता देने की कोई बाध्यता नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह मजदूरी करता है, उसकी उम्र अधिक है और तबीयत ठीक नहीं रहती, जबकि सावित्री देवी सिलाई करके अच्छी कमाई कर लेती है।
कोर्ट ने क्या कहा
खंडपीठ ने दलीलों को नकारते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के स्पष्टीकरण में ‘पत्नी’ शब्द के दायरे में वह महिला भी आती है जिसका तलाक हो चुका है और जिसने दोबारा विवाह नहीं किया है। चूंकि सावित्री देवी अभी अविवाहित हैं, इसलिए उन्हें भत्ता पाने का पूरा हक है।
अदालत ने रिकॉर्ड खंगालने पर पाया कि सुरजीत ने एक व्यावसायिक ऋण लिया था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि वह केवल मजदूर नहीं, बल्कि ठेकेदारी का काम भी करता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि शारीरिक रूप से सक्षम पति को किसी भी स्थिति में पत्नी के भरण-पोषण से मुख नहीं मोड़ना चाहिए। आर्थिक तंगी या कर्ज का हवाला देकर इस दायित्व से बचा नहीं जा सकता।
फैसले में कहा गया कि कानून का मूल मकसद महिलाओं को बेसहारा होने से बचाना है, ताकि वे सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें। वर्तमान महंगाई और हालात को देखते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 4,000 रुपये प्रति माह की राशि उचित और संतुलित है।
इस तरह हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए सुरजीत की याचिका खारिज कर दी।