दैनिक खबरनामा। जम्मू, 11 अगस्त: साल 2001 में जम्मू-कश्मीर में रोशनी कानून लागू किया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला की सरकार का तर्क था कि दशकों से लोग सरकारी जमीनों पर बसे हुए हैं और अब उन्हें हटाना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए कब्जाधारियों को जमीन का स्वामित्व देकर उससे मिलने वाली राशि बिजली परियोजनाओं में लगाई जाएगी।

शुरुआत में इस कदम को राजस्व बढ़ाने वाला फैसला बताया गया, लेकिन कुछ ही वर्षों में इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने लगे। कानून के तहत जम्मू क्षेत्र में लगभग 1 लाख से 1.5 लाख कनाल सरकारी भूमि को कब्जाधारियों के नाम कर दिया गया।

लाभार्थियों में बड़ा हिस्सा एक समुदाय का

रोशनी योजना के तहत जमीन पाने वालों में 85 से 90 फीसदी लोग मुस्लिम समुदाय से बताए जाते हैं। इसी आधार पर आलोचकों ने इसे “भूमि संबंधी सुनियोजित बदलाव” करार दिया। नवंबर 2018 में तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने इस कानून को रद्द कर दिया और पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंप दी।

यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा। सुनवाई के दौरान याचिकाओं में कहा गया कि इस कानून के पीछे जम्मू की जनसंख्या संरचना बदलने का उद्देश्य था।

इक्कजुट जम्मू ने तैयार की रिपोर्ट

अब यह पूरा ब्योरा “इक्कजुट जम्मू” की केंद्रीय समिति के सामने रखा जाएगा। संगठन के संस्थापक अधिवक्ता अंकुर शर्मा का कहना है कि बुधवार को समिति सदस्यों के साथ बैठक हो सकती है। उसमें बताया जाएगा कि कैसे कश्मीर के कुछ नेताओं और दलों ने जम्मू के इर्द-गिर्द आबादी बसाने की रणनीति बनाई और रोशनी कानून उसी का एक हिस्सा था। संगठन ने इस मुद्दे को समय रहते उठाया था, जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर सरकार को दी गई जमीनें वापस लेनी पड़ीं।

अंकुर शर्मा के अनुसार इक्कजुट जम्मू ने जनसंख्या बदलाव पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1994 में जम्मू शहर में सिर्फ 3 मस्जिदें थीं, जबकि अब उनकी संख्या 100 से अधिक हो चुकी है। बठिंडी इलाके में जंगल की जमीन पर कब्जे के बाद वहां घनी बस्ती बस जाने का भी जिक्र किया गया है।

शर्मा का आरोप है कि जम्मू में बदलाव सिर्फ रोहिंग्या या बांग्लादेशी नागरिकों के कारण नहीं हुआ, बल्कि राजनीतिक संरक्षण के साथ एक खास समुदाय को बसाया गया। इन सभी तथ्यों को वे केंद्रीय समिति के समक्ष रखेंगे।

आंकड़े क्या कहते हैं

2001 में जब रोशनी कानून आया था, तब जम्मू-कश्मीर में कुल 20.55 लाख कनाल सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा दर्ज था। इस कानून के अंतर्गत करीब 33 हजार आवेदनों को मंजूरी मिली। इनमें 25 हजार मामले जम्मू संभाग के और लगभग 4500 मामले कश्मीर संभाग के थे। मंजूर हुए मामलों में कुछ राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के नाम भी शामिल बताए जाते हैं।

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