दैनिक खबरनामा। जम्मू, 20 अगस्त: तीन दशक से ज्यादा के अंतराल के बाद कश्मीर घाटी में अमेरिका के राजदूत का दौरा दुनिया के लिए एक बड़ा संदेश लेकर आया है। इस यात्रा को भारत की कश्मीर नीति पर वाशिंगटन की सहमति के रूप में भी देखा जा रहा है।
राजदूत ने श्रीनगर में डल झील से लेकर शहर के अन्य हिस्सों तक खुले तौर पर भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने अलगाववादी नेताओं और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों से कोई मुलाकात नहीं की। उनके इस कदम और घाटी में सामान्य जनजीवन को देखकर यह साफ हो गया कि अब यहां आतंक का दौर पीछे छूट चुका है।
पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ी
पाकिस्तान ने इस दौरे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह यात्रा कितनी महत्वपूर्ण थी। पिछले कुछ हफ्तों में लश्कर-ए-तैयबा और उससे जुड़े समूहों के जरिए घाटी में कई जगह आतंकी वारदातें कराई गईं। ये सभी घटनाएं श्री अमरनाथ यात्रा के दौरान हुईं।
इसका मकसद दुनिया को यह दिखाना था कि कश्मीर में हालात अब भी ठीक नहीं हैं। प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया गया और सोशल मीडिया पर कश्मीरी पंडितों को धमकियां भी दी गईं। लेकिन पाकिस्तान का यह प्रचार अब काम नहीं आ रहा। वैश्विक स्तर पर अब उसकी बातों पर भरोसा करने वाले बहुत कम हैं।
पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय छवि को मिलेगा बल
पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर में अमेरिका, रूस समेत कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम हो चुके हैं। वहां पहुंचे सभी प्रतिनिधियों ने जमीनी बदलाव को खुद देखा है।
अमेरिकी राजदूत के इस दौरे और उनके बयान के बाद कश्मीर की छवि दुनिया में और बेहतर होगी। इसका सीधा असर जम्मू-कश्मीर के पर्यटन पर पड़ेगा। पहलगाम हमले के बाद विदेशी सैलानियों में जो डर बना था, वह अब कम होगा और वे बिना भय के घाटी आ सकेंगे।
अब उम्मीद है कि जम्मू-कश्मीर सरकार भी इस बदले माहौल को वैश्विक मंच पर मजबूती से रखेगी, ताकि दुनिया को कश्मीर की नई हकीकत ठीक से समझ आए।