दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 11 अगस्त : हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) भारतीय सशस्त्र बलों के लिए ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में रसद पहुंचाने और खुफिया, निगरानी एवं टोही अभियानों के लिए विशेष घूर्णी पंख वाला मानवरहित हवाई वाहन विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।

हालांकि एचएएल ने इस परियोजना के बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन माना जा रहा है कि इसका उद्देश्य ऐसे स्वायत्त हवाई मंच तैयार करना है, जो कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में बिना पायलट के महत्वपूर्ण सामान पहुंचाने के साथ-साथ लगातार निगरानी भी कर सकें।

आरयूएवी-200 या मानवरहित ध्रुव?

अभी यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं है कि एचएएल की नई पहल आरयूएवी-200 परियोजना पर केंद्रित है या फिर कंपनी मौजूदा उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर ‘ध्रुव’ का मानवरहित संस्करण विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

आरयूएवी-200 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा आईआईटी कानपुर के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इसे विशेष रूप से ऊंचाई वाले इलाकों में आवश्यक सामान पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।

दूसरी ओर, यदि ध्रुव हेलीकॉप्टर का मानवरहित संस्करण विकसित किया जाता है, तो यह भारत की मानवरहित रसद क्षमता को काफी बड़े स्तर पर बढ़ा सकता है।

लद्दाख और सियाचिन जैसे क्षेत्रों में होगा बड़ा फायदा

भारतीय सेना के लिए ऐसे मानवरहित हवाई वाहनों की जरूरत खास तौर पर लद्दाख और सियाचिन जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में महसूस की जाती है। इन क्षेत्रों में तापमान कई बार माइनस 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सैनिकों तक आवश्यक सामान पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।

मानवरहित घूर्णी-पंख वाले विमान पारंपरिक हवाई पट्टी की जरूरत के बिना छोटे स्थानों से उड़ान भर और उतर सकते हैं। इनके जरिए अग्रिम चौकियों तक भोजन, दवाइयां, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाया जा सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे अभियानों में हेलीकॉप्टर के पायलटों को अत्यधिक ऊंचाई और खराब मौसम के जोखिम में नहीं डालना पड़ेगा।

रसद के साथ निगरानी का भी काम

एचएएल की प्रस्तावित मानवरहित प्रणाली को दोहरी भूमिका के लिए तैयार किए जाने की संभावना है। एक ओर यह सैन्य रसद पहुंचाएगी, वहीं दूसरी ओर खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही अभियानों में भी इस्तेमाल की जा सकेगी।

ऐसे मानवरहित विमानों में दिन और रात दोनों समय निगरानी करने वाले विद्युत-प्रकाशीय कैमरे लगाए जा सकते हैं। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार निगरानी संभव होगी।

इसके अलावा, इनका इस्तेमाल प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत सामग्री पहुंचाने और दुर्गम पर्वतीय इलाकों में मानवीय सहायता अभियानों के लिए भी किया जा सकता है।

आरयूएवी-200 की खास क्षमताएं

आरयूएवी-200 को भारत की महत्वपूर्ण स्वदेशी मानवरहित रसद परियोजनाओं में से एक माना जाता है। यह सह-अक्षीय रोटर प्रणाली वाला मानवरहित विमान है, जिसे विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संचालन के लिए तैयार किया गया है।

परियोजना से जुड़े विवरणों के अनुसार, इसमें वंकेल इंजन का इस्तेमाल किया गया है। इसका अधिकतम उड़ान भार करीब 200 किलोग्राम है और यह लगभग 40 किलोग्राम तक का भार करीब 100 किलोमीटर की दूरी तक ले जाने में सक्षम होने के लिए डिजाइन किया गया है।

यह प्रणाली पूरी तरह स्वायत्त उड़ान क्षमता और दुर्घटना की स्थिति में सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। इसकी अधिकतम परिचालन ऊंचाई करीब 6,000 मीटर बताई जाती है। ऊर्ध्वाधर उड़ान और उतरने की क्षमता इसे पहाड़ी और सीमित स्थान वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी बनाती है।

मानवरहित ध्रुव हुआ तो बदल जाएगी क्षमता

दूसरी संभावना उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर ध्रुव के मानवरहित संस्करण की है। ध्रुव करीब 5.5 टन वर्ग का बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टर है। यदि इसका स्वायत्त संस्करण विकसित किया जाता है, तो यह छोटे मानवरहित रसद वाहनों की तुलना में कहीं अधिक भारी सामान और लंबी दूरी के मिशन संभाल सकता है।

दो शक्ति टर्बोशाफ्ट इंजनों से लैस ध्रुव के मानवरहित संस्करण का इस्तेमाल भारी रसद, घायलों को निकालने और बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियानों में किया जा सकता है। इससे ऐसे जोखिमपूर्ण अभियानों को बिना पायलट के संचालित करने की संभावना बढ़ जाएगी।

मौजूदा ध्रुव बेड़े से मिलेगा फायदा

मानवरहित ध्रुव का एक बड़ा फायदा यह होगा कि भारतीय सशस्त्र बल पहले से ही बड़ी संख्या में ध्रुव हेलीकॉप्टरों का संचालन करते हैं। ऐसे में इसका मानवरहित संस्करण मौजूदा उत्पादन ढांचे, रखरखाव व्यवस्था और कलपुर्जा आपूर्ति प्रणाली के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है।

हालांकि, एचएएल ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि उसकी हालिया पहल आरयूएवी-200 को अंतिम रूप देने, मानवरहित ध्रुव को आगे बढ़ाने या दोनों परियोजनाओं को एक व्यापक मानवरहित हेलीकॉप्टर कार्यक्रम के तहत विकसित करने से जुड़ी है।

हिमालयी सीमाओं पर स्वायत्त तकनीक की बढ़ती जरूरत

दुनिया भर में सेनाएं मानवरहित हेलीकॉप्टर और अन्य स्वायत्त प्रणालियों पर तेजी से निवेश कर रही हैं। इनका उद्देश्य अग्रिम मोर्चों तक रसद पहुंचाना, वास्तविक समय में खुफिया जानकारी जुटाना और सैनिकों के जोखिम को कम करना है।

भारत के लिए हिमालयी सीमाओं पर ऐसी तकनीक विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। अत्यधिक ऊंचाई, अचानक बदलता मौसम और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां पारंपरिक हवाई अभियानों को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

ऐसे में नियमित रसद आपूर्ति और निगरानी जैसे कार्यों के लिए मानवरहित हवाई प्रणालियों का इस्तेमाल भारतीय सशस्त्र बलों के हेलीकॉप्टर बेड़े पर दबाव कम कर सकता है। इससे मानवयुक्त हेलीकॉप्टरों को अधिक महत्वपूर्ण युद्धक और सामरिक अभियानों के लिए उपलब्ध रखा जा सकेगा।

एचएएल की यह पहल भारत के रक्षा क्षेत्र में स्वायत्त और अगली पीढ़ी की हवाई प्रणालियों की ओर बढ़ते कदम का संकेत देती है।

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