दैनिक खबरनामा | 5 अगस्त 2026, पानीपत :पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पानीपत के उरलाना कलां में वर्ष 2018 में 12 वर्षीय बच्ची के अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या से जुड़े चर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए प्रदीप और सागर उर्फ कल्लू को दी गई फांसी की सजा निरस्त करते हुए मामले में री-ट्रायल कराने का निर्देश दिया है।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस रमेश चंदर डिमरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह आदेश आरोपियों को दोषमुक्त करने के उद्देश्य से नहीं दिया गया है। अदालत का कहना है कि सुनवाई के दौरान सामने आई प्रक्रियागत कमियों को दूर कर निष्पक्ष और विधिसम्मत ट्रायल सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसी कारण केस को दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित सत्र अदालत (ट्रायल कोर्ट) भेजा गया है।
13 जनवरी 2018 को हुई थी वारदात
मामला 13 जनवरी 2018 की शाम का है। उरलाना कलां निवासी 12 वर्षीय बच्ची शाम करीब छह बजे घर से कूड़ा फेंकने निकली थी। आरोप है कि प्रदीप और सागर उर्फ कल्लू उसे जबरन अगवा कर प्रदीप के घर ले गए, जहां उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और बाद में गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई। मामले की सुनवाई के बाद 18 फरवरी 2022 को ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को हत्या, सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद सजा की पुष्टि के लिए मर्डर रेफरेंस और दोषियों की अपील हाईकोर्ट में लंबित थी।
जांच में गंभीर चूक पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने साफ लिखा था कि यौन उत्पीड़न के संबंध में अंतिम चिकित्सकीय राय फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) और रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद दी जाएगी। बाद में आई FSL रिपोर्ट में पीड़िता के वैजाइनल स्वैब और स्लाइड पर मानव स्पर्म मिलने की पुष्टि भी हुई थी। इसके बावजूद जांच एजेंसी ने यह रिपोर्ट डॉक्टरों को भेजकर अंतिम मेडिकल राय प्राप्त नहीं की। अदालत ने इसे जांच अधिकारी, संबंधित SHO और पर्यवेक्षण अधिकारियों की गंभीर लापरवाही माना।
निष्पक्ष न्याय के लिए री-ट्रायल जरूरी
खंडपीठ ने कहा कि इतने गंभीर और संवेदनशील मामले में जांच संबंधी ऐसी बड़ी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि केवल प्रक्रियागत खामियों के कारण आरोपियों को बरी कर दिया जाए तो यह पीड़िता और उसके परिवार के साथ अन्याय होगा। इसलिए न्याय के हित में मामले को उसी चरण से दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेजा गया है, जहां जांच प्रक्रिया में यह कमी रह गई थी।