दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 17 अगस्त: पंजाब यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। सितंबर के पहले हफ्ते में होने वाले छात्रसंघ चुनाव से पहले कैंपस में सभी संगठन अपनी-अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।
पिछले दो साल के नतीजों ने इस बार का मुकाबला बेहद कांटे का बना दिया है। साल 2024 में पहली दफा किसी निर्दलीय प्रत्याशी ने अध्यक्ष की कुर्सी जीती थी, जिससे पारंपरिक छात्र संगठनों का गणित गड़बड़ा गया था। इसके तुरंत बाद पिछले साल इतिहास रचा गया जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी ने पहली बार PU में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। लगातार बदल रही इस तस्वीर ने हर संगठन के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।
इस बार चुनाव में करीब 5 हजार नए छात्र पहली बार वोट डालेंगे। यूनिवर्सिटी में कुल लगभग 16 हजार मतदाता हैं और इनमें से एक तिहाई हिस्सा नए वोटरों का है। ऐसे में इनकी पसंद ही तय करेगी कि बाजी किसके हाथ लगेगी। इसी वजह से सभी दल अब फ्रेशर्स को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दाखिला प्रक्रिया के दौरान भी विभागों के बाहर हेल्प डेस्क लगाकर और काउंसलिंग कर नए छात्रों तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई थी।
कब शुरू हुई चुनावी परंपरा
PU में छात्रसंघ चुनाव की शुरुआत अकादमिक सत्र 1965-66 में हुई थी। साल 1977 में यहां प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली लागू की गई जिसके तहत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के चार पदों के लिए चुनाव होता है। बीच में कुछ कारणों से 1983 में चुनाव पर रोक लग गई थी। छात्रों के आंदोलन के बाद 1997 में फिर से चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई। तब से यूनिवर्सिटी प्रशासन हर साल शांतिपूर्ण माहौल में चुनाव कराता है और इसमें चुनाव आयोग व अदालत के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है।
मैदान में ये संगठन
इस बार के चुनाव में एबीवीपी, स्टूडेंट्स फॉर सोसाइटी यानी एसएफएस, एनएसयूआई, स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया यानी सोई, इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन यानी इनसो, पंजाब यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन यानी पुसु, छात्र युवा संघर्ष समिति यानी सीवाईएस और आईएसओ यानी इंडियन स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन सक्रिय भूमिका में दिखेंगे।
नए वोटरों की बड़ी संख्या और पिछले दो साल में बदले समीकरणों के कारण इस बार सभी की निगाहें PU के इस सियासी संग्राम पर टिकी हैं।