दैनिक खबरनामा | दिल्ली, 2 जून :  दिल्ली के साकेत क्षेत्र में बहुमंजिला इमारत के गिरने की घटना न केवल बेहद दुखद है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण के खतरनाक गठजोड़ को भी उजागर करती है। इस हादसे ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर चेतावनियों और नियमों के बावजूद अवैध निर्माण कैसे जारी रहते हैं और जिम्मेदार एजेंसियां समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं कर पातीं।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इमारत में पहले से ही अवैध रूप से दो अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं, जबकि तीसरी मंजिल का निर्माण कार्य जारी था। कमजोर ढांचे पर बढ़ते भार के कारण इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। हादसे का मलबा पास स्थित कैंटीन पर जा गिरा, जहां कई छात्र मौजूद थे। सौभाग्य से बड़ी जनहानि नहीं हुई, लेकिन यह घटना एक बड़े खतरे की गंभीर चेतावनी है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अनधिकृत निर्माण से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान 13 अप्रैल को एमसीडी ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया था कि भवन में किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं चल रहा है। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग निकली। इससे न केवल निगरानी व्यवस्था की विफलता सामने आती है, बल्कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई जानकारी की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने हादसे की मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं और दिल्ली नगर निगम ने लापरवाही के आरोप में दो इंजीनियरों को निलंबित कर दिया है। हालांकि केवल निलंबन या जांच के आदेश पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अवैध निर्माण को संरक्षण देने वाले पूरे तंत्र की जवाबदेही तय की जाए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित हो।

देश में अक्सर देखा गया है कि किसी बड़े हादसे के बाद जांच समितियां गठित कर दी जाती हैं, कुछ समय तक चर्चा होती है, लेकिन बाद में मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। नतीजतन न तो व्यवस्था में सुधार होता है और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।

इस मामले में मकान मालिक और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है तथा मकान मालिक को गिरफ्तार भी किया गया है। जिस इलाके में यह हादसा हुआ, वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्रों का प्रमुख केंद्र है। बढ़ती मांग के चलते कई मकान मालिक अधिक कमाई के लालच में नियमों की अनदेखी कर अवैध निर्माण कर देते हैं। मजबूरी में छात्र भी ऐसे भवनों में रहने को विवश होते हैं, जहां सुरक्षा मानकों का घोर अभाव होता है। कई इमारतों में संकरी सीढ़ियां, अपर्याप्त निकास मार्ग और अग्नि सुरक्षा उपायों की कमी आम बात है।

अवैध निर्माण केवल इमारतों को ही नहीं गिराता, बल्कि अनेक परिवारों के सपनों और भविष्य को भी मलबे में बदल देता है। इसलिए जरूरी है कि सरकार और प्रशासन दोषियों के खिलाफ उदाहरणात्मक कार्रवाई करें। साथ ही प्रभावित क्षेत्र और अन्य संवेदनशील इलाकों में व्यापक सर्वेक्षण चलाकर अवैध निर्माणों की पहचान की जाए तथा सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

जब तक नियमों का उल्लंघन करने वालों और उन्हें संरक्षण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे रुकने वाले नहीं हैं। यह समय केवल जांच का नहीं, बल्कि व्यवस्था में स्थायी सुधार और जवाबदेही तय करने का है।

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