दैनिक खबरनामा । मंडी, 14 जून : सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति और मनाली क्षेत्र के बीच प्रस्तावित चिनाब-ब्यास सुरंग जलविद्युत परियोजना को गति देने की तैयारी शुरू कर दी है। रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस परियोजना का विस्तृत ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया गया है। परियोजना के तहत चंद्रा नदी के जल का उपयोग कर 432 मेगावाट बिजली उत्पादन किया जाएगा।

परियोजना में अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय तकनीक का उपयोग होगा। भूमिगत विद्युत गृह की लंबाई 123 मीटर, चौड़ाई 21 मीटर और ऊंचाई 40 मीटर प्रस्तावित है। यहां 108-108 मेगावाट क्षमता की चार इकाइयां स्थापित की जाएंगी, जिनमें वर्टिकल शाफ्ट पेल्टन टरबाइन का उपयोग होगा। साथ ही भूमिगत ट्रांसफार्मर कैवर्न और 220 केवी क्षमता का आधुनिक जीआईएस सबस्टेशन भी बनाया जाएगा।

अटल टनल के पास बनेगा बैराज, मढ़ी में होगा जल निकास

परियोजना का बैराज स्थल लाहुल घाटी के कोकसर गांव से लगभग 500 मीटर डाउनस्ट्रीम तथा अटल टनल रोहतांग के नॉर्थ पोर्टल से करीब 7.5 किलोमीटर अपस्ट्रीम स्थित चंद्रा नदी पर प्रस्तावित है। सुरंग का आउटफॉल क्षेत्र मनाली के मढ़ी गांव के समीप ब्यास नाले के पास होगा, जो मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

परियोजना के लिए बनेगी नई सड़क

भारी मशीनरी और निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए कोकसर पुल से बैराज स्थल तक लगभग 500 मीटर लंबी सड़क का निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग से टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) लॉन्चिंग पोर्टल तक करीब एक किलोमीटर लंबी सड़क भी विकसित की जाएगी।

8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग से चंद्रा का पानी पहुंचेगा ब्यास में

परियोजना के तहत मढ़ी क्षेत्र में ब्यास नाले पर पुल या कल्वर्ट बनाकर टनल बोरिंग मशीन स्थापित की जाएगी। इसके माध्यम से लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण होगा, जिससे चिनाब बेसिन की सहायक नदी चंद्रा का जल ब्यास नदी में प्रवाहित किया जाएगा। केंद्र सरकार से परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है और एनएचपीसी ने निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है।

मलबे और पत्थरों का होगा उपयोग

निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाले मलबे और पत्थरों का उपयोग कंक्रीट और अन्य निर्माण कार्यों में किया जाएगा। कोकसर बैराज क्षेत्र में लगभग 2.5 लाख टन नदी तल सामग्री उपलब्ध है। वहीं सुरंग और पहुंच मार्गों की खुदाई से निकलने वाले करीब 4.5 लाख टन रॉक मैटेरियल और टनल मक्क को प्रसंस्कृत कर बजरी और रेत के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

ऊर्जा और जल प्रबंधन दोनों के लिए महत्वपूर्ण परियोजना

विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना न केवल हिमाचल प्रदेश की जलविद्युत क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाएगी। रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में विकसित होने वाली यह परियोजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल मानी जा रही है।

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