दैनिक खबरनामा 23 जून : एलन मस्क की सैटेलाइट-आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक एशिया के दो सबसे बड़े देशों—चीन और भारत—में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। चीन में इस सेवा पर प्रतिबंध लगा हुआ है, जबकि भारत में इसे अभी तक पूर्ण रूप से संचालन की अनुमति नहीं मिली है। ऐसे में दुनिया भर में तेजी से विस्तार कर रही स्टारलिंक की एशियाई रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं।
चीन सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और इंटरनेट नियंत्रण से जुड़े कारणों का हवाला देते हुए स्टारलिंक को अपने देश में संचालित होने की अनुमति नहीं देती। वहीं भारत में नियामकीय मंजूरियों, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के चलते कंपनी का विस्तार अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
12 जून को स्पेसएक्स के रिकॉर्ड आईपीओ के साथ एलन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए हैं। लेकिन स्पेसएक्स की सबसे मुनाफे वाली शाखा स्टारलिंक को दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों, भारत और चीन, से बाहर कर दिया गया है। नैस्डैक पर ऐतिहासिक लिस्टिंग की तैयारी के बीच एक अमेरिकी प्रीमियम न्यूज ग्रुप ने बताया कि भारत ने एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक के कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने के लिए जरूरी मंजूरियां रोक दी हैं। आईपीओ के बाद स्पेसएक्स का वैल्यूएशन 2 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका है, लेकिन इस वैल्यूएशन का केंद्र स्टारलिंक है। दो सबसे बड़े इंटरनेट बाजारों से बाहर होने से निवेशकों के लिए बड़े जोखिम सामने आए हैं।
चीन में पहले से बैन, अब भारत में अटकी
चीन में स्टारलिंक पहले से प्रतिबंधित है। बीजिंग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है और स्पेसएक्स को वहां लाइसेंस नहीं दिया गया है। विदेशी जहाजों को भी चीनी जलक्षेत्र में प्रवेश करते ही स्टारलिंक टर्मिनल बंद करने का आदेश है। पिछले साल दिसंबर में चीन ने एक विदेशी जहाज पर अवैध रूप से स्टारलिंक इस्तेमाल करने के लिए पहली पेनल्टी लगाई थी। सुरक्षा जोखिमों के चलते दुनिया के दो सबसे बड़े इंटरनेट बाजारों से बाहर होना दर्शाता है कि भविष्य में कई और देश भी स्टारलिंक को अपने यहां रोक सकते हैं।
भारत ने क्यों रोकी मंजूरी?
गृह मंत्रालय के तहत भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने स्टारलिंक के लॉन्च के लिए जरूरी अंतिम मंजूरी रोक दी है। स्टारलिंक को करीब एक साल पहले ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट (जीएमपीसीएस) लाइसेंस मिल चुका था। इससे कंपनी तैयारी और कमर्शियल समझौते कर सकती थी, लेकिन सेवा शुरू करने की अंतिम मंजूरी नहीं मिली थी। स्टारलिंक ने टेलीकॉम अथॉरिटी के सामने सुरक्षा प्रदर्शन भी किए, लेकिन अधिकारियों ने अतिरिक्त स्पष्टीकरण और अनुपालन मांगे। अंतिम फैसला ईरान युद्ध में कंपनी की विवादित भूमिका के बाद लिया गया। हालांकि स्टारलिंक ने रिपोर्ट को खारिज किया है। स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस-प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रेयर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, “अज्ञात स्रोतों के आधारहीन दावों पर बनी भ्रामक खबरों के उलट, स्टारलिंक भारत सरकार के साथ सक्रिय और सकारात्मक बातचीत में है। भारत की संप्रभु तकनीक, नियामक और सुरक्षा जरूरतों के मुताबिक हमने भारत के लिए एक विशेष डिप्लॉयमेंट मॉडल तैयार किया है।
वित्तीय असर और निवेशकों की चिंता
काउंटरपॉइंट रिसर्च के को-फाउंडर नील शाह ने एक्स पर लिखा, “अगर भारत लाइसेंस में देरी करता है या रोकता है, तो स्टारलिंक दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी तक पहुंच खो सकता है। स्पेस एक्सप्लोरेशन और एआई बिल्ड-आउट को सब्सिडी देने वाली रेवेन्यू की कहानी निवेशकों की नजर में प्रभावित होगी।” शाह ने कहा कि भारत जैसे संवेदनशील और विवादित सीमाओं वाले देश के लिए, घरेलू खुफिया एजेंसियों की पहुंच से बाहर चलने वाले अनमॉनिटर्ड, अनट्रेसेबल सैटेलाइट टर्मिनल “पूरी तरह रेड लाइन” हैं।
सुरक्षा से जुड़े जोखिम
ईरान में हाल के युद्ध के दौरान, बिना लाइसेंस के भी स्टारलिंक टर्मिनल का इस्तेमाल असंतुष्टों और विदेशी सरकारों के एजेंटों ने किया। सूत्रों के मुताबिक इस साल की शुरुआत में ईरान में करीब 50,000 स्मगल्ड स्टारलिंक टर्मिनल अवैध रूप से चल रहे थे। जनवरी 2026 के प्रदर्शनों में जब ईरानी अधिकारियों ने इंटरनेट ब्लैकआउट किया, तब स्टारलिंक प्रदर्शनकारियों के लिए बाहरी दुनिया से जुड़ने का जरिया बन गया। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) में शिकायत की कि स्टारलिंक बिना लाइसेंस के उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। आईटीयू बोर्ड ने चिंता जताई कि स्टारलिंक के पास अवैध टर्मिनल एक साथ ब्लॉक करने की क्षमता होने के बावजूद उसने ईरान में ऐसा नहीं किया। इससे भारत में चिंता बढ़ी है कि भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिका आधारित कम्युनिकेशन प्रोवाइडर पर सरकार का नियंत्रण कितना होगा।
अमेरिकी सरकार पर निर्भरता का जोखिम
स्पेसएक्स अपने फाइनेंस के लिए अमेरिकी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और रेगुलेटरी मंजूरियों पर निर्भर है। 2026 के आईपीओ फाइलिंग के मुताबिक कंपनी की करीब 20 प्रतिशत आय अमेरिकी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट से आती है। स्पेसएक्स राष्ट्रपति ट्रंप के ‘गोल्डन डोम’ प्रोजेक्ट में भी अहम भूमिका निभाएगा, जिसमें मिसाइल डिफेंस शील्ड के लिए सैकड़ों सेंसर और इंटरसेप्टर लगाए जाएंगे। इससे अमेरिकी सरकार के पास मस्क और स्पेसएक्स पर काफी दबाव बनाने की क्षमता है। अगर अमेरिकी रणनीतिक हित भारत से टकराते हैं, तो वाशिंगटन स्पेसएक्स पर स्टारलिंक के भारतीय ऑपरेशन का डेटा साझा करने, किसी क्षेत्र में कवरेज बनाए रखने या बंद करने का दबाव डाल सकता है। आलोचकों को डर है कि भू-राजनीतिक तनाव के दौरान स्टारलिंक भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के खिलाफ काम कर सकता है। एक बड़ा जोखिम यह है कि अमेरिका-नियंत्रित सिस्टम के तौर पर स्टारलिंक आपदा या सैन्य ऑपरेशन के दौरान जरूरी कनेक्टिविटी बंद कर सकता है, जबकि संवेदनशील सीमा क्षेत्रों या उग्रवाद प्रभावित इलाकों में भारत सेवा बंद कराना चाहे तो कंपनी इनकार कर सकती है।
आतंक और तस्करी में इस्तेमाल की आशंका
दिसंबर 2024 में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने मणिपुर में एक उग्रवादी समूह से स्टारलिंक उपकरण बरामद किए। मस्क ने एक्स पर जवाब दिया, “यह गलत है। भारत के ऊपर स्टारलिंक सैटेलाइट बीम बंद हैं।” इसी महीने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में ड्रग तस्कर गहरे समुद्र में नेविगेशन के लिए स्टारलिंक इस्तेमाल करते पाए गए। भारतीय अधिकारियों ने स्टारलिंक से यूजेज हिस्ट्री मांगी, लेकिन कंपनी ने प्राइवेसी कानूनों का हवाला देकर इनकार कर दिया। तक्षशिला फाउंडेशन ने इस साल एक रिसर्च पेपर में कहा, “स्टारलिंक के साथ मुख्य जोखिम यह है कि यह भारत सरकार की सेवा उपलब्धता प्रबंधित करने की क्षमता सीमित करता है। सरकार जब किसी इलाके में सेवा बंद करना चाहे तो स्टारलिंक अवैध रूप से चालू रह सकती है। इसके उलट, जब सरकार को सेवा चाहिए तो स्टारलिंक बंद हो सकती है।
डेटा और जासूसी की चिंता
इस साल स्टारलिंक ने अपनी ग्लोबल प्राइवेसी पॉलिसी अपडेट कर ग्राहकों का सटीक लोकेशन डेटा, आईपी एड्रेस और “कम्युनिकेशन इंफॉर्मेशन” जैसे ऑडियो, इलेक्ट्रॉनिक या विजुअल डेटा को मशीन लर्निंग और एआई मॉडल ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी। पॉलिसी तीसरे पक्ष के साथ डेटा साझा करने की भी इजाजत देती है। अमेरिका के फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट (FISA) की धारा 702 के तहत सभी अमेरिकी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को गैर-अमेरिकी नागरिकों के ईमेल, टेक्स्ट, वॉयस और वीडियो कॉल अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ साझा करने होते हैं।
यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक का रुख
फरवरी 2022 में यूक्रेन में सेवा शुरू करने के बाद स्टारलिंक वहां की सरकारी और सैन्य संचार की रीढ़ बन गया। इसके बावजूद मस्क ने कई बार जियोफेंसिंग के जरिए पहुंच रोकी। उन्होंने क्रीमिया के पास स्टारलिंक चालू करने के यूक्रेन के अनुरोध को ठुकरा दिया, जिससे रूस के बेड़े पर हमला नाकाम हो गया। 8 सितंबर 2023 को मस्क ने एक्स पर लिखा, “सेवस्तोपोल तक स्टारलिंक चालू करने का आपात अनुरोध था। साफ मकसद रूसी बेड़े को डुबोना था। अगर मैं मान लेता तो स्पेसएक्स युद्ध के बड़े कृत्य में सीधे शामिल होता।” 2025 में मस्क ने कहा, “मेरा स्टारलिंक सिस्टम यूक्रेनी सेना की रीढ़ है। अगर मैं बंद कर दूं तो उनकी पूरी फ्रंट लाइन ढह जाएगी।” पिछले साल फरवरी में यूक्रेन को चेतावनी दी गई कि अगर वह रेयर अर्थ मिनरल्स पर समझौता नहीं करता तो स्टारलिंक सेवा बंद कर दी जाएगी। इससे दिखा कि स्टारलिंक की पहुंच को हथियार बनाकर देश को ब्लैकमेल किया जा सकता है।
निष्कर्ष
स्पेसएक्स का रिकॉर्ड आईपीओ भले ही मस्क को दुनिया का पहला ट्रिलियनेयर बना दे, लेकिन भारत और चीन से स्टारलिंक का बाहर होना गहरी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की चिंताओं को उजागर करता है। यह कंपनी की ग्रोथ और वैल्यूएशन के लिए बड़ा जोखिम है।