दैनिक खबरनामा | 7 अगस्त | नई दिल्ली: करीब दो दशक से लंबित बोफोर्स घोटाले से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है। याचिका के जरिए हिंदुजा बंधुओं को सभी आरोपों से मुक्त करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट का पुराना निर्णय प्रभावी बना रहा।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ के सामने मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने अदालत से चार सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया, ताकि याचिका में शामिल उन दो हिंदुजा बंधुओं के नाम हटाए जा सकें, जिनका निधन हो चुका है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने मामले के इतने लंबे समय से लंबित रहने पर सवाल उठाया। उन्होंने जानना चाहा कि अब हिंदुजा बंधुओं और सीबीआई से संबंधित ऐसा कौन-सा मुद्दा बचा है, जिस पर आगे सुनवाई की आवश्यकता है। पीठ ने यह भी पूछा कि 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या निष्कर्ष दिया था।
31 मई 2005 को हाईकोर्ट ने आरोप किए थे खारिज
दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस आर.एस. सोढ़ी ने 31 मई 2005 को फैसला सुनाते हुए हिंदुजा बंधुओं—श्रीचंद हिंदुजा, गोपीचंद हिंदुजा और प्रकाश हिंदुजा—के साथ स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ लगाए गए सभी आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सीबीआई के पास मौजूद स्वीडिश अधिकारियों से प्राप्त दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाया था। अदालत के अनुसार, ये दस्तावेज न तो मूल थे और न ही प्रमाणित प्रतियां। ऐसे दस्तावेजों को आधार बनाकर आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा आगे बढ़ाना उचित नहीं था।
कमजोर साक्ष्यों पर मुकदमा चलाना बताया था अनुचित
हाईकोर्ट ने कहा था कि अपर्याप्त और अप्रमाणित साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को वर्षों तक चलने वाली जटिल कानूनी प्रक्रिया में बनाए रखना उचित नहीं होगा। अदालत ने इसे न्यायपालिका और आम जनता के समय तथा संसाधनों की बर्बादी बताया था। अपने फैसले में अदालत ने आरोपियों को इस तरह मुकदमे में उलझाए रखने को उनके साथ “क्रूर मजाक” तक कहा था।
अदालत ने यह भी माना था कि सीबीआई यह स्थापित करने में असफल रही कि हिंदुजा बंधुओं की 1986 के बोफोर्स तोप सौदे को भारत तक पहुंचाने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी। जांच एजेंसी यह भी साबित नहीं कर पाई थी कि हिंदुजा बंधुओं को प्राप्त धनराशि उसी सौदे से संबंधित कथित रिश्वत या कमीशन थी।
करीब 14 साल चला कानूनी विवाद
हाईकोर्ट के फैसले के बाद तीनों हिंदुजा बंधुओं की जमानत राशि वापस करने का भी आदेश दिया गया था। इस फैसले के साथ ही उनके खिलाफ करीब 14 वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद समाप्त हो गया था। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनौती वाली याचिका खारिज किए जाने के बाद 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को बरकरार रखा गया है।