दैनिक खबरनामा | 7 अगस्त, नई दिल्ली: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में आय के आधार पर ‘क्रीमी लेयर’ की व्यवस्था लागू करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि SC और ST आरक्षण पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। सरकार ने शीर्ष अदालत से इन याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह भी किया है।

केंद्र ने अपने जवाब में कहा कि आरक्षण से जुड़ी नीतियां तैयार करना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे नीतिगत फैसलों में न्यायपालिका का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

SC-ST आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं

केंद्र सरकार के मुताबिक SC, ST और OBC वर्गों के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार एक जैसा नहीं है। अनुसूचित जातियों को ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है, जबकि अनुसूचित जनजातियों का पिछड़ापन उनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों और भौगोलिक अलगाव से जुड़ा रहा है।

हलफनामे में कहा गया है कि SC और ST समुदायों की पहचान केवल उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं हुई है। इनके आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करना है। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा मुख्य रूप से OBC वर्ग के आर्थिक रूप से संपन्न तबके को आरक्षण के लाभ से अलग रखने के लिए विकसित हुई थी, जिसका आधार 1992 का ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसला है।

नीति में बदलाव से पहले व्यापक अध्ययन जरूरी

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि आरक्षण व्यवस्था में किसी तरह का बदलाव करने अथवा आय के आधार पर उप-कोटा निर्धारित करने से पहले विस्तृत सामाजिक और आर्थिक अध्ययन किया जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि ऐसे संवेदनशील नीतिगत बदलाव पर्याप्त शोध और व्यापक समीक्षा के बाद ही किए जा सकते हैं।

हलफनामे में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व फैसले में स्पष्ट तौर पर SC और ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का निर्देश नहीं दिया गया है। अदालत के पुराने फैसलों में क्रीमी लेयर को लेकर की गई टिप्पणियां मुख्य रूप से OBC और SEBC वर्गों के संदर्भ में थीं।

सात जजों की संविधान पीठ के फैसले के बाद उठा मुद्दा

SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि 1 अगस्त 2024 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ी है। सात जजों की संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत से SC और ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-classification) की अनुमति दी थी।

फैसले के दौरान संविधान पीठ के चार न्यायाधीशों ने अपनी अलग-अलग राय में SC/ST वर्ग के अपेक्षाकृत संपन्न लोगों की पहचान कर उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखने की जरूरत का भी उल्लेख किया था।

पूर्व जस्टिस बी.आर. गवई ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान की मूल भावना और वास्तविक समानता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए ऐसा कदम जरूरी हो सकता है।

अश्विनी उपाध्याय समेत कई लोगों ने दाखिल की याचिकाएं

इसके बाद वकील अश्विनी उपाध्याय, रामाशंकर प्रजापति और अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर SC/ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू करने की मांग की।

अब केंद्र ने इन याचिकाओं पर अपने हलफनामे में इस मांग का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि SC और ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का कोई स्पष्ट न्यायिक आधार मौजूद नहीं है। साथ ही, याचिकाकर्ताओं की ओर से किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को भी स्थापित नहीं किया गया है।

केंद्र ने इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से इन सभी याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया है।

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