दैनिख खबरनामा। शिमला, 17 अगस्त: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपदा के बाद हुए पुनर्वास कार्यों और कंपनियों के सीएसआर फंड के खर्च में बरती जा रही लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर अपने कानूनी कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकतीं।
कोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि अगर दोनों सरकारों ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो उनके खिलाफ भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
17 हजार करोड़ का नुकसान, सिर्फ 4,427 करोड़ खर्च
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में हिमाचल में आई आपदाओं से करीब 17,428 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। लेकिन राहत, मरम्मत और पुनर्निर्माण पर अब तक केवल 4,427.68 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं।
इस हिसाब से प्रदेश में आपदा पुनर्वास के लिए अभी भी 13,001 करोड़ रुपये का बड़ा अंतर बचा है। इस कमी को पूरा करने के लिए हिमाचल सरकार अब उत्तराखंड और ओडिशा के सीएसआर मॉडल का अध्ययन कर रही है।
कंपनियां कर रहीं नियमों की अनदेखी
खंडपीठ ने पाया कि हिमाचल में कार्यरत कई सरकारी और निजी कंपनियां कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135(5) का पालन नहीं कर रही हैं। कानून के मुताबिक कंपनियों को पहले अपने प्रोजेक्ट वाले इलाके में सीएसआर खर्च करना होता है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बता रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन ने हिमाचल में 2022-23 में सिर्फ 1.58 करोड़ और 2023-24 में 2.22 करोड़ रुपये ही खर्च किए। वहीं इसी दौरान एनटीपीसी ने उत्तर प्रदेश को 40.16 करोड़, बिहार को 24.10 करोड़, महाराष्ट्र को 29.87 करोड़ और ओडिशा को 18.83 करोड़ रुपये दिए।
कोर्ट ने रिकॉर्ड में दर्ज किया कि हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु और लेह-लद्दाख जैसे राज्यों को कुल सीएसआर राशि में से बेहद “सामान्य” हिस्सा ही मिला है, जो पूरी तरह गलत है।
आंकड़ों में बड़ा फर्क, 81 कंपनियों ने नहीं दी जानकारी
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि हिमाचल में काम कर रही 81 कंपनियों ने अब तक अपनी सीएसआर देनदारी की जानकारी राज्य सरकार को नहीं सौंपी है। साथ ही केंद्रीय कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और राज्य सरकार के हलफनामों में दिए गए आंकड़ों में भी बड़ा अंतर है।
केंद्र सरकार ने एनटीपीसी, एनएचपीसी, एसजेवीएन और एनएचएआई जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा हिमाचल में किए गए खर्च को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है।
कोर्ट ने मांगा नया हलफनामा
हाईकोर्ट ने 23 अप्रैल 2026 को दिए अपने आदेशों का चार महीने बाद भी पालन न होने पर सख्ती दिखाई। अदालत ने केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को निर्देश दिया कि वे नए सिरे से विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। इसमें यह बताना होगा कि नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर क्या कार्रवाई हुई और कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी।