चंडीगढ़ 31 जनवरी 2026( दैनिक खबरनामा) पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक जवान को बड़ी राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि शादी जैसे निजी कारण से मात्र तीन दिन की अनुपस्थिति के आधार पर सेवा से हटाना न केवल असंगत है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और संविधान में निहित समानता के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।जस्टिस संदीप मौदगिल ने अपने फैसले में सीआरपीएफ को जवान को सेवा में पुनः बहाल करने, पूरी सेवा निरंतरता देने और बकाया वेतन का भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित करने का आदेश दिया है।मामला हरियाणा के भिवानी निवासी नवीन से जुड़ा है, जिनकी सीआरपीएफ में 5 जनवरी 2015 को अस्थायी नियुक्ति हुई थी। उन्होंने गुरुग्राम, बिहार, केरल, महाराष्ट्र के लातूर और ग्वालियर में प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के दौरान उनके पैर में चोट भी आई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपनी ड्यूटी जारी रखी।अप्रैल 2017 में नवीन की शादी तय थी। उन्होंने इसके लिए विभाग से अवकाश की मांग की, लेकिन अनुमति नहीं दी गई। मजबूरन वे 26 से 29 अप्रैल 2017 तक तीन दिन अनुपस्थित रहे और 28 अप्रैल को विवाह के तुरंत बाद वापस ड्यूटी पर लौट आए। इसके बावजूद ग्वालियर स्थित ग्रुप सेंटर के कमांडेंट ने बिना कोई शो-कॉज नोटिस जारी किए और बिना विभागीय जांच कराए, 19 मई 2017 को उन्हें सीसीएस (टेंपरेरी सर्विस) नियमों के तहत सेवा से हटा दिया। उनकी विभागीय अपील भी 18 जनवरी 2018 को खारिज कर दी गई।हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को कठोर शब्दों में गलत ठहराते हुए कहा कि जब सेवा से हटाने का आधार कथित अनुशासनहीनता हो, तो उसे “टर्मिनेशन सिम्प्लिसिटर” बताकर जांच से बचा नहीं जा सकता। अदालत ने माना कि यह कार्रवाई दंडात्मक थी और बिना जांच किए किया गया निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।कोर्ट ने कहा कि दो वर्षों से अधिक प्रशिक्षण और सेवा दे चुके जवान को विवाह जैसे निजी कारण से तीन दिन की अनुपस्थिति पर बाहर करना पूरी तरह अनुपातहीन और मनमाना है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और निष्पक्षता के अधिकार का उल्लंघन करता है।अदालत ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि अनुशासन के नाम पर मानवता और न्याय को कुचला नहीं जा सकता और वर्दी पहनने से कोई भी नागरिक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं हो जाता।

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