पंजाब 15 फरवरी 2026 (दैनिक खबरनामा) पंजाब में
गन्ने की फसल को लाल सड़न (रत्ता रोग), सूखा रोग, काली कंगियारी और पोका बोइंग जैसी कई बीमारियां प्रभावित करती हैं। इनसे बचाव के लिए बुवाई से पहले बीज का फफूंदनाशक दवा से उपचार करना बेहद जरूरी है।यह जानकारी देते हुए पंजाब के केन कमिश्नर डॉ. अमरीक सिंह ने बताया कि इन बीमारियों में लाल सड़न सबसे घातक है। इस रोग ने गन्ने की सबसे अधिक बोई जाने वाली किस्म सीओ 0238 को बुरी तरह प्रभावित किया, जिसके कारण अब इस किस्म का रकबा नाममात्र रह गया है।उन्होंने बताया कि वर्तमान बहार सीजन की गन्ना बुवाई शुरू हो चुकी है और इस वर्ष 1.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ना लगाने का लक्ष्य रखा गया है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रत्येक गन्ना मिल के अधिकृत क्षेत्रों में किसान जागरूकता कैंप लगाए जा रहे हैं, ताकि किसानों तक आधुनिक खेती तकनीक पहुंचाई जा सके।
डॉ. सिंह ने बताया कि विश्व में सबसे पहले 1895-1901 के दौरान आंध्र प्रदेश के गोदावरी डेल्टा में लाल सड़न रोग ने कई किस्मों को प्रभावित किया था। पंजाब में 1950-51 में सीओ 312 और 313 किस्में, 1992 में सीओजे 64, सीओ 1148 और सीओजे 82 तथा वर्ष 2021-22 में सीओ 0238 किस्म इस रोग की चपेट में आई थी। भारी नुकसान को देखते हुए पंजाब सरकार ने सीओ 0238 के स्थान पर अन्य किस्मों को बढ़ावा देने का फैसला लिया था।
उन्होंने बताया कि इस रोग के लक्षणों में पौधे की ऊपरी पत्तियों का पीला पड़ना और बाद में सूख जाना शामिल है। संक्रमित गन्ने को चीरने पर अंदर का गूदा लाल दिखाई देता है, जिसमें सफेद लंबे धब्बे नजर आते हैं और उसमें से शराब जैसी गंध आती है।गन्ना आयुक्त ने किसानों को सलाह दी कि वे बुवाई के लिए बीज विश्वसनीय स्रोत से लें और उपचार के बाद ही बोआई करें। जिस खेत में यह रोग पाया जाए, वहां अगले 1-2 वर्षों तक गन्ना न बोया जाए। संक्रमित पौधों को जड़ से उखाड़कर जला देना चाहिए और रोगग्रस्त फसल की मूंढी (रैटून) नहीं रखनी चाहिए।बीज उपचार के लिए 100 मिलीलीटर एसिड इज़ोक्सीस्ट्रोबिन 18.2% + डाइफेनोकोनाजोल 11.4% एससी फफूंदनाशक को 100 लीटर पानी में घोलकर गन्ने के बीज (गुल्ली या टुकड़े) को डुबोकर तुरंत निकाल लेना चाहिए। ऐसा करने से बुवाई के बाद लगने वाली बीमारियों से फसल की सुरक्षा होती है और खेती की लागत भी कम होती है।