नई दिल्ली 18 फरवरी 2026( दैनिक खबरनामा ) नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी महिला द्वारा रिश्ते के दौरान दी गई सहमति को बाद में वापस लेकर सहमति से बने संबंध को केवल रिश्ता टूटने के कारण आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि क्रिमिनल लॉ का इस्तेमाल बदले, दबाव या निजी रंजिश निकालने के लिए नहीं किया जा सकता।जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को वास्तविक यौन शोषण, जबरदस्ती और गलत इस्तेमाल से बचाना है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि क्रिमिनल कानून निराशा या उम्मीद टूटने पर सजा देने का माध्यम नहीं बन सकता, बल्कि इसका मकसद केवल असली अपराध को दंडित करना है। अदालत ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में आते हैं, तो उसके कानूनी और सामाजिक परिणामों को रिश्ते के बिगड़ने के बाद नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।यह टिप्पणी अदालत ने एक वकील और उसके रिश्तेदारों को रेप, धोखे से शादी और अन्य गंभीर आरोपों से बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए की।
महिला ने 2022 में दर्ज FIR में आरोप लगाया था कि आरोपी ने वर्षों तक उसका यौन शोषण किया और अपना धर्म व शादीशुदा होने की बात छिपाई। महिला का दावा था कि उसे शादी के लिए मजबूर किया गया और अश्लील तस्वीरों के जरिए धमकाया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि रिश्ता करीब 11 साल तक चला, इस दौरान महिला आरोपी के साथ खुलेआम रही, पढ़ाई करती रही, वकालत करती रही और सामान्य सामाजिक गतिविधियों में शामिल रही। कोर्ट ने यह भी माना कि उपलब्ध सबूतों से संकेत मिलता है कि महिला को आरोपी के धर्म और शादीशुदा होने की जानकारी पहले से थी।कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पढ़ा-लिखा वयस्क व्यक्ति समझदारी से लंबे समय तक किसी रिश्ते में रहता है, तो बाद में केवल रिश्ता खत्म होने के आधार पर कानून के जरिए उस रिश्ते के इतिहास को अपराध में नहीं बदला जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि क्रिमिनल लॉ का उद्देश्य असली पीड़ितों की सुरक्षा है, न कि सहमति से बने रिश्ते को बाद में जबरन अपराध घोषित करना।

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