दैनिक खबरनामा 4 अप्रैल 2026 नाबालिग बच्चे की कस्टडी को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी मामले में बच्चे का हित सर्वोपरि होता है और केवल अधिक पढ़ा-लिखा होना किसी व्यक्ति को बेहतर अभिभावक नहीं बनाता। इसी आधार पर कोर्ट ने डॉक्टर पिता की अपील को खारिज करते हुए बच्चे की कस्टडी मां के पास ही बनाए रखने के आदेश को बरकरार रखा।हाईकोर्ट ने श्री मुक्तसर साहिब की फैमिली कोर्ट के 15 जनवरी 2026 के फैसले को सही ठहराते हुए उसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। पिता ने कोर्ट में दलील दी थी कि वह पेशे से डॉक्टर हैं और ज्यादा शिक्षित व सक्षम होने के कारण बच्चे की कस्टडी उन्हें मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और मुलाकात (विजिटेशन) का समय भी तय नहीं किया गया है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने पाया कि बच्चा पिछले करीब छह वर्षों से मां के साथ रह रहा है और इस दौरान उसकी देखभाल में किसी तरह की लापरवाही का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। ऐसे में कस्टडी बदलना बच्चे के हित में नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2019 में मां के खिलाफ दर्ज एक मामूली आपराधिक मामले को आधार बनाकर उसे अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसे उस मामले में प्रोबेशन मिल चुका है और उसके बाद उसके आचरण पर कोई सवाल नहीं उठा।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पिता को नौकरी के कारण लंबे समय तक घर से बाहर रहना पड़ता है, जबकि उनके साथ रहने वाले बुजुर्ग माता-पिता भी बीमार हैं। इसके विपरीत मां लगातार बच्चे के साथ रहकर उसकी देखभाल कर रही है।बच्चे की पढ़ाई को लेकर उठाए गए मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि फीस न भरने के कारण आई समस्या में पिता की भी जिम्मेदारी बनती है, इसलिए इस आधार पर मां की कस्टडी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पिता को बच्चे से मिलने के समय को लेकर कोई समस्या है, तो वह फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर इसे तय करवा सकते हैं, लेकिन यह कस्टडी बदलने का आधार नहीं हो सकता।