दैनिक खबरनामा। येरेवान, 8 जून : आर्मेनिया में हुए संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान की सत्तारूढ़ सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी ने स्पष्ट जीत हासिल करते हुए संसद में बहुमत सुनिश्चित कर लिया है। हालांकि चुनाव के दौरान रूस पर हस्तक्षेप और दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी आलोचना की है।

केंद्रीय चुनाव आयोग (सीईसी) द्वारा सोमवार को जारी परिणामों के अनुसार, सभी मतदान केंद्रों की मतगणना पूरी होने के बाद सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी को 49.8 प्रतिशत वोट मिले। देश के चुनावी ढांचे के तहत यह परिणाम पार्टी को संसदीय बहुमत दिलाने के लिए पर्याप्त है। चुनाव में लगभग 59 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जिसे मजबूत जनभागीदारी माना जा रहा है।

वहीं, रूस समर्थक माने जाने वाले दो प्रमुख विपक्षी गठबंधनों ने भी अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया। ‘स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया’ को 23.2 प्रतिशत और ‘आर्मेनिया अलायंस’ को 9.9 प्रतिशत वोट मिले। दोनों दल संसद में प्रवेश करने में सफल रहे, जबकि ‘प्रॉस्पेरस आर्मेनिया’ आवश्यक 4 प्रतिशत वोट हासिल नहीं कर सका।

अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने दावा किया कि मतदान से पहले रूस ने चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए अभूतपूर्व दबाव बनाया। यूरोप की परिषद की संसदीय सभा के पर्यवेक्षक मिशन की सदस्य एडिटा एस्ट्रेला ने कहा कि रूस ने सार्वजनिक धमकियों और व्यापारिक उपायों के माध्यम से चुनावी माहौल को प्रभावित करने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि एक संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में इस प्रकार का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है और यूरोपीय संसद के सदस्य इसकी कड़ी निंदा करते हैं।

दूसरी ओर, रूस ने पश्चिमी देशों पर चुनाव में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने कहा कि आर्मेनियाई समाज में रूस-आर्मेनिया संबंधों को मजबूत बनाए रखने की व्यापक मांग मौजूद है।

यह चुनाव वर्ष 2023 में अज़रबैजान द्वारा नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने के बाद आर्मेनिया का पहला संसदीय चुनाव था। इस संघर्ष ने क्षेत्रीय राजनीति को नई दिशा दी थी और पशिनयान सरकार को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया था।

विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत से पशिनयान को रूस पर निर्भरता कम करने और यूरोपीय देशों व पश्चिमी साझेदारों के साथ संबंध मजबूत करने की रणनीति को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। उनकी प्राथमिकताओं में अज़रबैजान के साथ स्थायी शांति समझौता और तुर्किये के साथ संबंधों का सामान्यीकरण शामिल है।

पशिनयान ने चुनावी जीत के बाद कहा कि आर्मेनियाई जनता ने क्षेत्रीय समृद्धि और सहयोग के पक्ष में मतदान किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस जनादेश का सकारात्मक संदेश तुर्किये और अज़रबैजान तक भी पहुंचेगा।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी पशिनयान को बधाई देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक आर्मेनिया और यूरोप के बीच साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है तथा यूरोप भविष्य में भी उसका समर्थन करता रहेगा।

हालांकि पशिनयान को संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया है, जो अज़रबैजान द्वारा मांगे गए संवैधानिक संशोधनों पर जनमत संग्रह कराने के लिए आवश्यक है। अज़रबैजान चाहता है कि आर्मेनिया अपने संविधान से नागोर्नो-काराबाख पर कथित दावे से जुड़े प्रावधानों को हटाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संविधान संशोधन को लेकर जनमत संग्रह नहीं कराया जाता है तो अज़रबैजान शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखा सकता। ऐसी स्थिति में पशिनयान सरकार को घरेलू राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

इस बीच विपक्षी दलों ने चुनाव प्रक्रिया और परिणामों पर सवाल उठाए हैं। यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन (ओएससीई) के पर्यवेक्षकों ने अधिकांश क्षेत्रों में मतदान को शांतिपूर्ण बताया, लेकिन चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं और उम्मीदवारों के खिलाफ हुई गिरफ्तारियों को लेकर चिंता व्यक्त की।

‘स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया’ के संस्थापक सैमवेल करापेटयान, जो वर्तमान में नजरबंद हैं, ने दावा किया कि उनकी पार्टी से जुड़े 700 से अधिक लोगों को चुनाव से पहले हिरासत में लिया गया। वहीं पूर्व राष्ट्रपति रॉबर्ट कोचरयान के नेतृत्व वाले ‘आर्मेनिया अलायंस’ ने पशिनयान द्वारा समय से पहले जीत की घोषणा को चुनाव आयोग पर दबाव बनाने और सत्ता हथियाने की कोशिश बताया है।

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