दैनिक खबरनामा । मुंबई, 3 जुलाई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी को जिले से बाहर निकालने के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि सिर्फ सरकार की नीतियों का विरोध करने पर किसी भी नागरिक को उसके निवास क्षेत्र से निष्कासित नहीं किया जा सकता। इस प्रकरण की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति माधव जामदार ने राज्य सरकार और मुंबई पुलिस के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई।
दरअसल, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद चौधरी के खिलाफ मुंबई पुलिस ने तड़ीपार की कार्रवाई की थी। पुलिस का तर्क था कि चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन किए थे। उनके खिलाफ 5 एफआईआर दर्ज होने का हवाला देते हुए पुलिस ने 1 साल के लिए निष्कासन का आदेश जारी किया था।
कोर्ट की सख्त टिप्पणियां*
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कहा कि चौधरी ने सरकार विरोधी नारेबाजी की। इस पर जस्टिस जामदार ने एफआईआर की प्रति देखने के बाद टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने केवल ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए थे। उन्होंने सवाल किया, “क्या भारत के नागरिक इस तरह के नारे नहीं लगा सकते? महज नारेबाजी के आधार पर किसी को तड़ीपार करना कहां तक उचित है?”
न्यायाधीश ने तीखे शब्दों में पूछा, “आखिर यह हो क्या रहा है? क्या देश के सारे नागरिकों से भारत सरकार की गुलामी कराई जा रही है? क्या उन्हें धरना-प्रदर्शन करने का हक भी नहीं है?”
पुलिस की मंशा पर उठाए सवाल
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देते हैं। पुलिस का यह कदम बदनीयती से भरा हुआ है।
जस्टिस जामदार ने मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए कहा, “इन दिनों लगातार पेपर लीक की घटनाएं सामने आ रही हैं। अगर जनता इसके विरोध में सड़कों पर उतरे, तो क्या पुलिस उन पर मुकदमे ठोक देगी? विरोध करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।” अंत में कोर्ट ने पुलिस को सख्त हिदायत दी कि पुलिसकर्मी जनता के सेवक होते हैं, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत कर्मचारी नहीं।
आदेश कब जारी हुआ था?
गौरतलब है कि सईद अहमद चौधरी को उनके इलाके से एक साल के लिए बाहर करने का आदेश मुंबई के पुलिस उपायुक्त (जोन 6) ने 3 दिसंबर 2025 को जारी किया था। बाद में कोंकण मंडल के मंडलीय आयुक्त ने 27 मार्च 2026 को इस आदेश को बरकरार रखा था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब दोनों आदेशों को रद्द कर दिया है।