दैनिक खबरनामा 3 जुलाई 2026 नई दिल्ली: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। श्रम मंत्रालय ने 29 जून को अधिसूचित कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 के तहत यह स्पष्ट किया है कि 15,000 रुपये की वैधानिक मासिक वेतन सीमा से अधिक वेतन पर किया जाने वाला ईपीएफ अंशदान अब अनिवार्य नहीं रहेगा। इसका प्रभाव देश के लगभग 8 करोड़ पीएफ खाताधारकों पर पड़ सकता है।
अब तक कर्मचारियों को अपने मूल वेतन (बेसिक सैलरी) का 12 प्रतिशत ईपीएफ में जमा करना होता था और नियोक्ता भी समान राशि का योगदान करता था। हालांकि, नए प्रावधानों के अनुसार कंपनियों के लिए केवल 15,000 रुपये की वेतन सीमा तक ही 12 प्रतिशत, यानी अधिकतम 1,800 रुपये का अंशदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। इससे अधिक योगदान कर्मचारी और नियोक्ता की सहमति से स्वैच्छिक आधार पर किया जा सकेगा।
क्या बदला है?
नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 का स्थान ले लिया है। पहले 15,000 रुपये की मासिक वेतन सीमा का उपयोग यह तय करने के लिए किया जाता था कि नियुक्ति के समय कौन-से कर्मचारी अनिवार्य रूप से ईपीएफ के दायरे में आएंगे। 15,000 रुपये या उससे कम मूल वेतन वाले कर्मचारियों को योजना में शामिल करना अनिवार्य था, जबकि इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए इसमें शामिल होना वैकल्पिक था।
एक बार किसी कर्मचारी के ईपीएफ के दायरे में आने के बाद, कई संस्थानों में वास्तविक मूल वेतन के आधार पर ईपीएफ अंशदान किया जाता था और नियोक्ता भी उसी अनुपात में योगदान देता था, भले ही वह सरकार द्वारा निर्धारित वेतन सीमा से अधिक हो। उल्लेखनीय है कि वर्तमान 15,000 रुपये की वेतन सीमा वर्ष 2014 में अधिसूचित की गई थी।
अब नई व्यवस्था के तहत कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का अनिवार्य अंशदान 15,000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा तक सीमित रहेगा। यानी नियोक्ता के लिए केवल 1,800 रुपये तक का योगदान देना अनिवार्य होगा। यदि कर्मचारी इससे अधिक राशि ईपीएफ में जमा करना चाहते हैं, तो वे स्वेच्छा से ऐसा कर सकेंगे।
नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 में यह भी कहा गया है कि किसी सदस्य के संबंध में देय अंशदान केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित वेतन सीमा के अधीन होगा।
20 दिनों में निपटाना होगा पीएफ दावा
नई व्यवस्था के तहत भविष्य निधि, पेंशन या बीमा से जुड़े दावों के निपटारे की समय-सीमा भी तय की गई है। यदि सभी आवश्यक दस्तावेज जमा होने के बावजूद दावा 20 दिनों के भीतर निपटाया नहीं जाता, तो संबंधित आयुक्त पर 12 प्रतिशत वार्षिक दंडात्मक ब्याज लगाया जा सकेगा। यह राशि संबंधित अधिकारी के वेतन से वसूली जाएगी।
श्रम मंत्रालय का कहना है कि इस प्रावधान का उद्देश्य दावों के निपटारे में अनावश्यक देरी रोकना और कर्मचारियों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, पहले भी विलंब होने पर ब्याज देने का प्रावधान मौजूद था, लेकिन अब इसे स्पष्ट रूप से 12 प्रतिशत वार्षिक निर्धारित कर दिया गया है। पहले ब्याज का भुगतान पीएफ पर घोषित ब्याज दर के आधार पर किया जाता था।
कर्मचारियों पर क्या होगा प्रभाव?
अब तक जिन कर्मचारियों का मूल वेतन 15,000 रुपये से अधिक था, उनके वास्तविक वेतन के आधार पर अधिक ईपीएफ अंशदान जमा होता था, जिससे उनकी दीर्घकालिक बचत भी अधिक बनती थी। नए नियम लागू होने के बाद यदि कर्मचारी और नियोक्ता केवल वैधानिक सीमा तक ही अंशदान करने का निर्णय लेते हैं, तो कर्मचारियों के हाथ में हर महीने अधिक वेतन आएगा, लेकिन उनके पीएफ खाते में जमा होने वाली राशि कम हो जाएगी।
हालांकि, यह बदलाव स्वतः लागू नहीं होगा। 1,800 रुपये से अधिक ईपीएफ अंशदान जारी रखने के लिए कर्मचारी और नियोक्ता के बीच आपसी सहमति आवश्यक होगी।