कोर्ट ने कहा- बालिग व्यक्ति को अपने धर्म, रहने की जगह और निजी जीवन से जुड़े फैसले लेने की पूरी स्वतंत्रता; महिलाओं को दस्तावेज और सामान लौटाने का भी आदेश
दैनिक खबरनामा। प्रयागराज, 11 अगस्त : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो बालिग हिंदू महिलाओं को उनकी इच्छा के अनुसार रहने और अपने धर्म से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता देते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया है। दोनों महिलाओं ने अदालत में दावा किया था कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है। कोर्ट ने माना कि उनके पिता ने धार्मिक पसंद को लेकर उन्हें कथित तौर पर अवैध रूप से घर में रोककर रखा था। इस मामले में अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार और महिलाओं के पिता को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन ने 6 अगस्त को दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि 35 और 20 वर्ष की दोनों बहनें बालिग हैं और उन्हें अपने धर्म, निवास तथा निजी मामलों के संबंध में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार है।
‘मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन’
अदालत ने दोनों महिलाओं को अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर और अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता प्रदान की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनके पिता या कोई अन्य व्यक्ति अथवा राज्य की एजेंसियां उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
अदालत ने इस मामले को संवैधानिक अधिकारों के असाधारण रूप से गंभीर उल्लंघन के तौर पर देखा। कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग व्यक्ति की धार्मिक आस्था और निजी पसंद के आधार पर उसे हिरासत में रखने का अधिकार माता-पिता को नहीं है।
₹25 लाख मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और महिलाओं के पिता अनिल कुमार भाटिया को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने राज्य सरकार को कानून और उचित प्रक्रिया के तहत इस राशि का 50 प्रतिशत महिलाओं के पिता से वसूलने की अनुमति दी है।
बाकी 50 प्रतिशत राशि उन दोषी सरकारी कर्मचारियों से वसूली जा सकती है, जिनके कृत्य या लापरवाही के कारण महिलाओं की स्वतंत्रता का असंवैधानिक रूप से हनन हुआ हो।
पिता को दस्तावेज लौटाने का निर्देश
अदालत ने महिलाओं के पिता को दोनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आवाजाही, निवास, पेशे और धार्मिक पसंद में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्देश दिया है। साथ ही राज्य प्रशासन को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि दोनों महिलाएं शांतिपूर्वक रह सकें और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
इसके अलावा पिता को सात दिनों के भीतर दोनों महिलाओं के पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाणपत्र, पहचान संबंधी दस्तावेज, बैंक पासबुक, चेकबुक, धर्म परिवर्तन से जुड़े दस्तावेज तथा अन्य मूल दस्तावेज और सामान वापस करने का आदेश दिया गया है।
पिता पर लगाया था अवैध हिरासत का आरोप
याचिका में महिलाओं की ओर से उनके वकील ने आरोप लगाया था कि उनके पिता ने मई 2025 में आगरा में पुलिस शिकायत दर्ज कराई थी, ताकि वे अपनी पसंद के फैसले न ले सकें। आरोप यह भी लगाया गया कि स्थानीय पुलिस की मदद से दोनों महिलाओं को उनके पिता की इच्छा के विरुद्ध कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।
महिलाओं के वकील ने अदालत में दलील दी कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि धर्म परिवर्तन के लिए बल, धोखाधड़ी, जबरदस्ती या छल का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।
राज्य सरकार ने बड़ी साजिश का दिया हवाला
राज्य सरकार ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि कथित धर्म परिवर्तन एक बड़े संगठित षड्यंत्र से जुड़ा हो सकता है और अवैध धर्म परिवर्तन के आरोपों की जांच चल रही है। राज्य ने एक आपराधिक मामले का भी हवाला दिया, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) और उत्तर प्रदेश के 2021 के धर्म परिवर्तन कानून की धाराएं लगाई गई हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि कथित धर्म परिवर्तन की वैधता और महिलाओं को अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने का सवाल दो अलग-अलग मुद्दे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि 2021 के धर्म परिवर्तन कानून के अनुपालन को लेकर कोई सवाल है, तब भी इससे पिता को दो बालिग महिलाओं को लगातार अपने कब्जे में रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
लंबित आपराधिक मामले पर असर नहीं पड़ेगा
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसका फैसला केवल महिलाओं की कथित अवैध हिरासत के मुद्दे तक सीमित है। अदालत की टिप्पणियों का लंबित आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और न ही इस आदेश से कथित धर्म परिवर्तन की वैधता या अवैधता का अंतिम निर्धारण किया गया है।
अदालत ने महिलाओं की हिरासत को “पूरी तरह अवैध” और कानूनी आधार से रहित बताया। कोर्ट ने कहा कि राज्य भी महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करने के अपने संवैधानिक दायित्व को निभाने में विफल रहा।
‘माता-पिता को बालिग बच्चों को कैद करने का अधिकार नहीं’
अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान माता-पिता को यह अधिकार नहीं देता कि वे अपने बालिग बच्चों को केवल इसलिए कैद कर दें क्योंकि वे उनकी आस्था, विश्वास या निजी फैसलों से असहमत हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों को माता-पिता के अधिकार, सामाजिक नैतिकता या बहुसंख्यक भावना के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और बल या दबाव के जरिए उसकी स्वतंत्रता को दबाने का कोई भी प्रयास संवैधानिक न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में उचित सार्वजनिक कानून संबंधी कार्रवाई के साथ मुआवजा भी दिया जा सकता है।