दैनिक खबरनामा। जम्मू, 19 अगस्त: शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर बनतालाब क्षेत्र के खेरी गांव में एक बार फिर धरती खिसकने लगी है। इससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। अब तक करीब 10 मकान इस आपदा की चपेट में आ चुके हैं। कई घरों में मोटी दरारें पड़ गई हैं, तो कुछ के हिस्से गिर भी गए हैं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ घरों के आसपास की जमीन 3 से 4 फीट तक नीचे बैठ गई है। इस वजह से पानी की लाइनें टूट गईं और बिजली की आपूर्ति भी बंद हो गई है। प्रभावित परिवारों को प्रशासन ने राहत के तौर पर टेंट उपलब्ध कराए हैं और फिलहाल वे उसी में रहने को विवश हैं। गौरतलब है कि यह वही इलाका है जहां पिछले साल भी भू-धंसाव की घटना हुई थी। तब 5 से 6 मकानों को नुकसान पहुंचा था। बनतालाब से ऊपर स्थित दो पंचायतें — कंगर और खेरी — इस बार सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रही हैं।
2025 में भी हुआ था भू-धंसाव
2025 में मानसून के बाद यहां पहली बार जमीन धंसने की खबर सामने आई थी। इस साल बरसात शुरू होते ही समस्या दोबारा लौट आई है। गांव वालों का कहना है कि इस बार हालात और बिगड़ गए हैं। क्षेत्र के दो मकान पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गए हैं, कुछ आधे गिर चुके हैं और दो घर जमीन खिसकने के कारण अधर में लटके हुए प्रतीत हो रहे हैं।
अधिकांश घरों की दीवारों पर बड़ी-बड़ी दरारें उभर आई हैं। लोगों को आशंका है कि अगली तेज बारिश में उनका आशियाना भी जमीन में समा सकता है। पिछले साल स्थिति का जायजा लेने के लिए भू-वैज्ञानिकों की टीम भी यहां पहुंची थी, लेकिन धंसाव की असल वजह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। ग्रामीणों का कहना है कि 2025 में बाढ़ और भारी बारिश के कारण यहां नुकसान हुआ था। उस समय प्रशासन ने मदद और मुआवजे का आश्वासन दिया था।
“बारिश ने सब उजाड़ दिया”
मौजूदा बरसात ने प्रभावित परिवारों की जिंदगी अस्त-व्यस्त कर दी है। न सिर पर पक्की छत है, न बिजली और न पीने का पानी। प्रशासन की ओर से अब तक तीन टेंट लगाए गए हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि टेंट में रहना भी सुरक्षित नहीं है। रात में सांप और बिच्छू निकलने का डर बना रहता है।
ग्रामीणों का दर्द है कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से पैसे जोड़कर कच्चे घरों को पक्का किया था, लेकिन अब सब बर्बाद हो गया। सरकार की ओर से दिए गए टेंट ही अब उनका सहारा हैं।
स्थानीय निवासी मोहम्मद आसिफ ने बताया, “घर भी नहीं बचा, बिजली-पानी भी नहीं है।” उनका आरोप है कि पिछले साल भी बाढ़ के बाद अधिकारियों ने सिर्फ नाम दर्ज किए थे। मुआवजे और राहत के लिए वे आज भी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस मदद नहीं मिली है।