दैनिक खबरनामा। श्रीनगर, 24 सितंबर: जम्मू-कश्मीर के छोटे शहरी निकायों में जनप्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने गुरुवार को विधानसभा में जम्मू-कश्मीर नगरपालिका (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। इस विधेयक में नगर निकायों के गठन और वार्ड निर्धारण से जुड़ी कानूनी उलझनों को दूर करने का प्रस्ताव रखा गया है।
प्रस्ताव के अनुसार, 5,000 तक की आबादी वाले नगरपालिका निकायों में निर्वाचित सदस्यों की न्यूनतम संख्या 5 से बढ़ाकर 7 करने की तैयारी है। साथ ही वार्ड तय करने की प्रक्रिया में कानून में मौजूद दोहरे प्रावधान को खत्म करने के लिए धारा 10(2) से ‘राज्य निर्वाचन आयोग’ के उल्लेख को हटाने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल है। सरकार का कहना है कि इन बदलावों से अधिनियम में मौजूद खामियां दूर होंगी और नगर निकायों के गठन की प्रक्रिया ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी।
एक ही धारा में दो अलग प्रावधान
दरअसल, मौजूदा जम्मू-कश्मीर नगरपालिका अधिनियम, 2000 की धारा 10 की उपधारा (1) में कहा गया है कि निर्वाचित सदस्यों की संख्या सात से कम नहीं होगी। लेकिन इसी धारा के साथ दी गई तालिका में 5,000 की आबादी वाली नगरपालिका समितियों या परिषदों के लिए पांच सदस्यों का जिक्र है। एक ही कानून में सात और पांच की संख्या को लेकर यह विरोधाभास बना हुआ था। इसी विसंगति को खत्म करने के लिए सरकार यह संशोधन लेकर आई है, जिसमें ‘पांच सदस्य’ की जगह ‘सात सदस्य’ करने का प्रस्ताव है।
वार्ड निर्धारण की प्रक्रिया होगी स्पष्ट
विधेयक का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा वार्डों के गठन से जुड़ा है। वर्तमान कानून की धारा 282 के तहत मतदाता सूची तैयार करना, वार्डों का निर्धारण, सीटों का आरक्षण और चुनावों की निगरानी का जिम्मा राज्य निर्वाचन आयोग का है। वहीं धारा 10(2) में भी राज्य निर्वाचन आयोग को वार्ड निर्धारण के लिए सरकार द्वारा अधिकृत प्राधिकारी के रूप में बताया गया है। सरकार का मानना है कि अलग-अलग धाराओं में एक ही जिम्मेदारी के दोहरे उल्लेख से भ्रम पैदा हो रहा है, इसलिए धारा 10(2) से आयोग के संदर्भ को हटाने का प्रस्ताव दिया गया है।
छोटे शहरों में बढ़ेगा प्रतिनिधित्व
यदि यह विधेयक कानून बन जाता है तो 5,000 की आबादी वाले छोटे नगर निकायों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या पांच से बढ़कर सात हो जाएगी। इससे स्थानीय स्तर पर लोगों की आवाज निकाय में बेहतर तरीके से उठ सकेगी और अलग-अलग इलाकों के मुद्दों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। हालांकि, इसका जमीनी असर कानून लागू होने के बाद वार्डों के नए सिरे से गठन और नियमों पर निर्भर करेगा।
विसंगति दूर करना है मकसद
सरकार ने विधेयक के उद्देश्य में साफ किया है कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि मौजूदा कानून की खामियों को दूर करने के लिए लाया गया संशोधन है। इसका मुख्य फोकस दो बातों पर है – सदस्यों की न्यूनतम संख्या को लेकर विरोधाभास खत्म करना और वार्ड निर्धारण के अधिकार को लेकर स्पष्टता लाना।
प्रस्तावित कानून राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से लागू होगा। अब सबकी निगाहें विधानसभा में इस विधेयक पर होने वाली आगे की चर्चा और पारित होने की प्रक्रिया पर टिकी हैं।