दैनिक खबरनामा । श्रीनगर, 30 जून : जम्मू-कश्मीर में सरकारी पदों की आउटसोर्सिंग पर चल रही बहस के बीच वन विभाग में 1300 से ज्यादा अस्थायी कर्मचारियों को निजी एजेंसियों के जरिए रखने की योजना से विवाद गहरा गया है।
प्रस्ताव सामने आते ही 2004 से काम कर रहे सैकड़ों कर्मचारियों ने नाराजगी जताई है। कर्मचारियों ने प्रशासन के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। दो दशक से नियमित होने की आस लगाए बैठे इन कर्मियों का कहना है कि आउटसोर्सिंग से उनकी नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है।
18 जून की बैठक में बनी सहमति
प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) की स्क्रीनिंग समिति की बैठक 18 जून को मुख्य सचिव की अगुवाई में हुई थी। बैठक में मौजूदा मानव संसाधन को आउटसोर्स करने के प्रस्ताव पर मुहर लगी।
समिति ने इसे राष्ट्रीय कैम्पा की कार्यकारी समिति से अंतिम मंजूरी के लिए भेजने की अनुशंसा की है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, सभी श्रेणियों के कर्मचारियों की भर्ती अब सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए होगी। इसका मकसद प्रक्रिया को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और कुशल बनाना बताया गया है।
20 साल की सेवा के बाद रोजगार संकट
फैसले की खबर मिलते ही कर्मचारियों में आक्रोश फैल गया। श्रीनगर में मुख्य वन्यजीव संरक्षक कार्यालय के बाहर बड़ी ताद में कर्मचारियों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि उन्होंने अपनी जवानी विभाग को दी, लेकिन अब उन्हें निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। इससे नौकरी की सुरक्षा खत्म हो जाएगी।
मंजूर अहमद बट समेत कई कर्मियों ने कहा कि अलग-अलग सरकारों ने नियमितीकरण का वादा किया था, मगर आउटसोर्सिंग के फैसले ने उनका भविष्य अधर में लटका दिया है। कर्मचारी रशीद अहमद के अनुसार, वन्यजीव विभाग के 308 कर्मियों को एक निजी कंपनी को सौंपने की तैयारी है। उन्होंने पूछा कि 2004 से लगातार काम कर रहे बाकी कर्मचारियों का क्या होगा। उनका दावा है कि ये लोग सिर्फ मजदूर नहीं हैं, बल्कि वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन, वाहन चलाने, जंगल की आग बुझाने और आपात सेवाओं में अहम रोल निभाते हैं।
कैम्पा के तहत मौजूदा सिस्टम और नया प्रस्ताव
कैम्पा व्यवस्था में जरूरत-आधारित अस्थायी कर्मचारी नियमित स्टाफ की कमी पूरी करते हैं। ये कर्मचारी वॉच एंड वार्ड, मौसमी फायर वॉचर्स, वृक्षारोपण की सुरक्षा, वन्यजीव संरक्षण और वनाग्नि रोकथाम जैसे काम देखते हैं।
कैम्पा समिति की रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 1370 अस्थायी मजदूरों के लिए 3,22,936 मानव-दिवस और करीब 1237 मौसमी फायर वॉचर्स तैनात करने का प्रस्ताव है। साथ ही इन सभी श्रेणियों के मानव संसाधन को आउटसोर्स करने की योजना है। इसका खर्च कैम्पा की वार्षिक योजना के ब्याज मद से किया जाएगा।
सियासी पारा भी चढ़ा
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। इस साल फरवरी में कर्मचारियों ने सत्तारूढ़ गठबंधन के 11 विधायकों से मिलकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से नियमितीकरण की मांग की थी। उन्होंने वेतन का भुगतान कैम्पा की बजाय नॉन-प्लान मद से करने को भी कहा था।
मुख्य वन्यजीव संरक्षक चतुर्भुज बेहरा का कहना है कि उनके कार्यालय को आउटसोर्सिंग से जुड़ी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि कैम्पा योजना में कर्मचारी जरूरत के हिसाब से अस्थायी तौर पर रखे जाते हैं। ये स्थायी नियुक्तियां नहीं होतीं और केंद्र से मिलने वाले फंड के आधार पर समय-समय पर होती हैं।
पिछले साल कैम्पा की 25वीं स्टीयरिंग समिति ने इन जरूरत-आधारित कर्मचारियों के वेतन को मंजूरी दी थी। इसके लिए 11.02 करोड़ रुपये का बजट तय हुआ था। कर्मचारियों का आरोप है कि पहले उन्हें आश्वासन मिलते रहे, लेकिन अब अचानक आउटसोर्सिंग का फैसला बड़ा झटका है।
आउटसोर्सिंग पर सियासी घमासान
सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग अब बड़ा सियासी मुद्दा बन गया है। विपक्षी दल पीडीपी और भाजपा इस नीति पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। पिछले दो साल में सरकार ने 29 विभागों में 200 से ज्यादा निजी कंपनियों के जरिए 22,454 पदों को आउटसोर्स किया है। इनमें सुरक्षा, हाउसकीपिंग, आईटी सेवाएं, सफाई, कंप्यूटर ऑपरेटर, ड्राइवर और तकनीकी स्टाफ शामिल हैं।
इन कंपनियों का चयन ई-गवर्नेंस मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल पर बोली के जरिए हुआ है। इन पर सालाना करीब 200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
भाजपा प्रवक्ता जोरावर सिंह जम्वाल और डॉ. हरि दत्त शिशु ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से सभी आउटसोर्स नियुक्तियां रद्द करने की मांग की है। उन्होंने संबंधित कंपनियों के अनुबंध खत्म करने को कहा है। उनकी मांग है कि सभी भर्तियां पूरी पारदर्शिता से हों।