दैनिक खबरनामा
16 जुलाई नई दिल्ली : केंद्र सरकार जन्म और मृत्यु पंजीकरण से संबंधित कानून में अहम संशोधन करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रस्तावित बदलाव के अनुसार, यदि किसी जन्म या मृत्यु की जानकारी दो वर्ष के भीतर संबंधित अधिकारियों को नहीं दी जाती है, तो ऐसे मामलों में पंजीकरण केवल प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (First-Class Judicial Magistrate) के आदेश के बाद ही किया जा सकेगा।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने बुधवार को ‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम’ में संशोधन का प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष पेश किया। सरकार का उद्देश्य विलंब से होने वाले पंजीकरण पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना, जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड समय पर दर्ज कराना तथा फर्जीवाड़े और दुरुपयोग की संभावनाओं को कम करना है। साथ ही, सरकार चाहती है कि जन्म और मृत्यु से जुड़े सभी रिकॉर्ड लगभग रियल-टाइम में डिजिटल प्रणाली के माध्यम से दर्ज हों, ताकि प्रशासनिक कार्यों और नीतिगत निर्णयों के लिए सटीक आंकड़े उपलब्ध रह सकें।
मौजूदा प्रावधानों के तहत प्रत्येक जन्म और मृत्यु का पंजीकरण 21 दिनों के भीतर स्थानीय रजिस्ट्रार के पास डिजिटल सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के जरिए कराना अनिवार्य है। यदि सूचना 30 दिनों के बाद लेकिन एक वर्ष के भीतर दी जाती है, तो निर्धारित शुल्क, स्वयं प्रमाणित (सेल्फ-अटेस्टेड) दस्तावेज और जिला रजिस्ट्रार या अधिकृत अधिकारी की लिखित अनुमति के आधार पर पंजीकरण कराया जा सकता है।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, एक वर्ष से अधिक की देरी होने पर संबंधित क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट (DM), उपमंडल मजिस्ट्रेट (SDM) या कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) की अनुमति मिलने पर पंजीकरण संभव है। हालांकि प्रस्तावित संशोधन लागू होने के बाद दो वर्ष तक की देरी वाले मामलों में यही प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन यदि देरी दो वर्ष से अधिक होती है, तो पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य होगा।
सरकार का मानना है कि यह प्रस्तावित संशोधन जन्म और मृत्यु संबंधी रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी, भरोसेमंद और समयबद्ध बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा।