दैनिक खबरनामा | 12 अगस्त | नई दिल्ली: पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामद होने के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से गठित संसदीय समिति ने उन्हें जिम्मेदार ठहराया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा अपने सरकारी आवास में बड़ी मात्रा में नकदी पाए जाने के संबंध में कोई संतोषजनक और विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
बुधवार को संसद में रखी गई समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम से 500 रुपये के नोटों की बड़ी संख्या बरामद हुई थी। इन नोटों की मौजूदगी को लेकर न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा सकी।
आग लगने के बाद सामने आया था मामला
यह पूरा मामला 14 मार्च 2025 की रात सामने आया था। न्यायमूर्ति वर्मा के आवास में आग लगने के बाद उसे बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोररूम में नकदी के ऐसे बंडल मिले थे, जो आंशिक रूप से जल चुके थे।
संसदीय समिति ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि बरामद नोट कहां से आए, उनके मालिक कौन थे और वे उनके सरकारी आवास के स्टोररूम में किस तरह पहुंचे। समिति के अनुसार, इन सवालों पर दिया गया स्पष्टीकरण भरोसेमंद नहीं था।
जांच में सबूतों की सुरक्षा पर भी सवाल
समिति ने मामले की जांच के दौरान साक्ष्यों को संभालने के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि अहम भौतिक सबूतों को उचित तरीके से सुरक्षित और संरक्षित नहीं किया गया। कानूनी प्रक्रिया के तहत स्टोररूम को सील कर जांच किए जाने से पहले ही वहां की स्थिति में बदलाव हो चुका था।
रिपोर्ट में बरामद नकदी के बाद में उपलब्ध नहीं होने या उसके गायब होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। समिति ने माना कि घटनास्थल को सुरक्षित रखने में हुई लापरवाही और आवास से जुड़े कर्मचारियों द्वारा स्टोररूम में की गई गतिविधियों के कारण महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्य प्रभावित हुए।
हालांकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि न्यायमूर्ति वर्मा ने स्वयं नकदी को वहां से हटाया था।
22 मार्च 2025 के लिखित जवाब पर भी टिप्पणी
समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से दिए गए जवाबों की भी समीक्षा की। विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके लिखित स्पष्टीकरण को समिति ने असंतोषजनक बताया। रिपोर्ट के अनुसार, उनके जवाब में पर्याप्त स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही दिखाई नहीं दी।
समिति की रिपोर्ट दो हिस्सों में तैयार की गई है। इसमें जांच के दौरान दर्ज की गई मौखिक गवाहियों के साथ-साथ दस्तावेजी साक्ष्यों को भी शामिल किया गया है।
आंतरिक जांच में भी आया था नियंत्रण का निष्कर्ष
इससे पहले तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति ने भी निष्कर्ष निकाला था कि जिस स्टोररूम से नकदी बरामद हुई, उस पर न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
विवाद सामने आने के समय न्यायमूर्ति वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत थे। मामले के बाद उनका तबादला उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था।
इसके बाद संसद की ओर से उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। हालांकि, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के इस्तीफा देने के बाद उनके खिलाफ चल रही यह प्रक्रिया प्रभावी तौर पर समाप्त हो गई।
अब संसदीय समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई और शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की संभावना पर नजरें टिक गई हैं।