दैनिक खबरनामा । मंडी, 23 जून ;  विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित भूमि के बदले मिलने वाले मुआवजे में देरी होने पर प्रभावित भूमि मालिकों को ब्याज पाने का कानूनी अधिकार है। जिला न्यायाधीश मंडी की अदालत ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) द्वारा दिए गए ब्याज संबंधी आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामला मंडी जिले की औट तहसील के कोठाधार गांव का है, जहां मनाली-चंडीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-21) के फोरलेन निर्माण के लिए दिवंगत सरन पाल की भूमि और उस पर बने ढांचे का अधिग्रहण किया गया था। सक्षम प्राधिकारी ने वर्ष 2018 में भूमि के लिए अनुपूरक मुआवजा निर्धारित किया था, लेकिन भूमि स्वामी इस राशि से संतुष्ट नहीं थे।

इसके बाद प्रभावित पक्ष ने मंडी के मंडलायुक्त सह मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) की अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद मध्यस्थ ने आदेश दिया कि भूमि मालिकों को मुआवजे की राशि पर पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत तथा उसके बाद 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाए।

इस आदेश के खिलाफ NHAI ने जिला अदालत में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत याचिका दायर की। प्राधिकरण का तर्क था कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 एक पूर्ण कानून है और इसमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 80 के तहत ब्याज देने का कोई प्रावधान नहीं है। NHAI ने यह भी कहा कि भूमि पर कब्जा लेने की सटीक तारीख का पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था।

हालांकि, अदालत ने NHAI की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय के एम. हकीम और गायत्री बालासामी मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मध्यस्थ के निर्णय में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक वह पूरी तरह तर्कहीन या कानून के विपरीत न हो।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण एक कल्याणकारी कानून के तहत किया जाता है और प्रभावित किसानों तथा मकान मालिकों को समय पर एवं उचित मुआवजा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है। ऐसे में मुआवजे के भुगतान में देरी होने पर ब्याज देना न केवल न्यायसंगत है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति के भी अनुरूप है।

अदालत ने मध्यस्थ द्वारा निर्धारित ब्याज को उचित ठहराते हुए NHAI की याचिका को खारिज कर दिया। यह फैसला भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के अधिकारों को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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