दैनिक खबरनामा । राजौरी, 7 जुलाई : पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर यानी पीओजेके में नाराजगी अब सड़कों से निकलकर खुले विरोध के रूप में सामने आ रही है। बढ़ती महंगाई, रोजगार की तंगी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे लोग अब वहां की हुकूमत और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।
इस बीच सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि सख्ती के बावजूद लोगों की मांग थमी नहीं है। उल्टा अब कुछ जगहों से भारत से जुड़ने और सहायता की गुहार भी सुनाई देने लगी है। इसका असर सीमा से सटे राजौरी, पुंछ और पूरे जम्मू संभाग में भी साफ देखा जा रहा है।
लगातार प्रदर्शन, प्रशासन पर दबाव के आरोप
पीओजेके के कई इलाकों में पिछले काफी समय से लोग सड़कों पर हैं। स्थानीय नागरिक समूह और संगठन महंगाई, बेरोजगारी, बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी और कथित सरकारी दमन को लेकर आवाज उठा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं सुना जा रहा।
स्थानीय निवासियों के मुताबिक विरोध को कुचलने के लिए कई बार सख्त कदम उठाए गए। लाठीचार्ज और फायरिंग तक की बातें सामने आई हैं। समय-समय पर इन घटनाओं के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हुईं, हालांकि हर दावे की स्वतंत्र पुष्टि संभव नहीं है। बावजूद इसके लोगों का हौसला टूटा नहीं और वे अपनी मांगें खुलकर रख रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि पीओजेके में समय-समय पर होने वाले ये प्रदर्शन इस ओर इशारा करते हैं कि वहां के लोग अपनी रोजमर्रा की दिक्कतों का हल चाहते हैं। हाल के दिनों में कुछ समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर भारत से रिश्ता और मदद की मांग उठाने की बातें भी सामने आई हैं। प्रदर्शनकारी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर जीवन स्तर की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे लंबे समय से आर्थिक तंगी और विकास के अभाव का सामना कर रहे हैं।
1947 की यादें और एलओसी के दोनों ओर की बेचैनी
सीमा से लगे राजौरी और पुंछ जिलों में पीओजेके की स्थिति को लेकर लगातार चर्चा है। नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ कई परिवार 1947 के विभाजन के बाद बिछड़ गए थे। आज भी राजौरी, पुंछ और जम्मू के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों के रिश्तेदार पीओजेके में रहते हैं। रिश्तेदारी और अन्य माध्यमों से वहां की खबरें यहां तक पहुंचती रहती हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग कहते हैं कि पीओजेके के आम नागरिक बेहतर जिंदगी चाहते हैं। उनका कहना है कि वे इलाके में अमन-चैन चाहते हैं और सीमा पार अपने परिजनों की सलामती व उज्ज्वल भविष्य की दुआ करते हैं। कई परिवार आज भी अपने बिछड़े रिश्तेदारों की यादों को संजोए हुए हैं।
मानवीय संपर्क की बात, फैसला द्विपक्षीय
सीमा क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि नियंत्रण रेखा के दोनों ओर भावनात्मक रिश्ते दशकों से कायम हैं। उनका कहना है कि अगर भविष्य में हालात बेहतर हों और दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़े तो मानवीय आधार पर लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा देने पर विचार हो सकता है। फिलहाल ऐसे किसी भी कदम का अधिकार दोनों देशों की सरकारों के पास है और यह पूरी तरह द्विपक्षीय नीति और सुरक्षा पहलुओं पर निर्भर करेगा। सीमा से जुड़े जानकारों के अनुसार एलओसी पर सुरक्षा व्यवस्था पहले की तरह मजबूत है और भारतीय सुरक्षा बल हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। भारत का आधिकारिक पक्ष शुरू से यही रहा है कि जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला हिस्सा भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है।
शांति और संवाद पर जोर
स्थानीय लोगों का कहना है कि आम लोगों की परेशानियों का हल बातचीत और मानवीय नजरिए से ही निकल सकता है। राजौरी-पुंछ के निवासियों का मानना है कि सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की सबसे बड़ी जरूरत सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर जीवन है। वे क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास देखना चाहते हैं।