दैनिक खबरनामा 8 मार्च 2026 Supreme Court of India ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले के बाद अब एक अहम संवैधानिक मुद्दे पर विचार शुरू किया है। बुधवार को नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास मानी जाएगी और इसे तय करने का अधिकार किसके पास है।सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से Tushar Mehta ने दलील दी कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस विषय पर फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रथा को अंधविश्वास माना जाता है, तो Article 25(2)(b) of the Indian Constitution के तहत इसमें सुधार करने का अधिकार विधायिका के पास है।हालांकि, इस पर न्यायमूर्ति Justice Ahsanuddin Amanullah ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद सुधार के लिए कानून बनाना विधायिका का काम है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि केवल विधायिका का ही निर्णय अंतिम होगा।यह सुनवाई आने वाले समय में धर्म, कानून और संविधान के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ा मार्गदर्शन तय कर सकती

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