चंडीगढ़ 6 जनवरी (जगदीश कुमार)सीबीआई की विशेष अदालत ने पीजीआईएमईआर (PGI) से जुड़े गरीब मरीज निधि (Poor Patient Fund) घोटाले के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए संस्थान के दो बर्खास्त कर्मचारियों सुनील कुमार और गगनप्रीत सिंह की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। दोनों पर गरीब मरीजों के लिए निर्धारित फंड में कथित रूप से हेराफेरी और गबन का आरोप है।सीबीआई ने यह मामला पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) की रिपोर्ट के आधार पर की गई प्रारंभिक जांच के बाद दर्ज किया था। जांच में सामने आया कि पीजीआई के प्राइवेट ग्रांट सेल (PGC) के अंतर्गत चल रही विभिन्न लाभार्थी योजनाओं में करीब 1.14 करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन का दुरुपयोग और गबन किया गया।अदालत में दोनों आरोपियों ने दलील दी कि उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है। उनका कहना था कि असली दोषियों को बचाने के लिए केमिस्टों द्वारा उनका नाम लिया गया। दोनों उस समय संस्थान में संविदा कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे और विभागीय जांच में उनका नाम शामिल नहीं किया गया था। आरोपियों ने यह भी कहा कि जांच समिति ने संविदा कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया है।आरोपियों ने तर्क दिया कि अपराध वर्ष 2021 में सामने आ गया था, लेकिन पीजीआईएमईआर प्रशासन ने इस मामले को चार वर्षों से अधिक समय तक छिपाए रखा। उन्होंने यह भी कहा कि वे जांच में सहयोग के लिए तैयार हैं और चूंकि उनकी सेवाएं समाप्त की जा चुकी हैं, इसलिए अब उनका संस्थान के रिकॉर्ड पर कोई नियंत्रण नहीं है।वहीं, सीबीआई की ओर से जमानत का कड़ा विरोध किया गया। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपी प्राइवेट ग्रांट सेल (PGC) में कार्यरत थे और उनकी जिम्मेदारी फंड के उपयोग से संबंधित प्रमाण-पत्र (Utilisation Certificates) तैयार कर फंडिंग एजेंसी को जारी करने की थी। अदालत ने टिप्पणी की कि इस स्तर पर आरोपियों और अन्य अधिकारियों/अज्ञात व्यक्तियों के बीच साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता, जिसके जरिए फंड के गबन को अंजाम दिया गया।अदालत ने यह भी कहा कि प्रारंभिक जांच में आरोपियों द्वारा प्रक्रियात्मक हेरफेर, पद के दुरुपयोग और नियमों के उल्लंघन के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह जांच का विषय है कि लापता या डिलीट की गई फाइलों तक आखिरी बार किसकी पहुंच थी और क्या वे फाइलें आरोपियों के यूजर आईडी से खोली गई थीं।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस चरण में ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह माना जाए कि आरोपियों को झूठा फंसाया गया है। प्रथम दृष्टया आरोप है कि उन्होंने फर्जी फाइलों की प्रोसेसिंग, झूठी नोटिंग, नकली सप्लाई ऑर्डर तैयार करने जैसे कृत्यों के माध्यम से अनुदान राशि के गबन में सक्रिय भूमिका निभाई।इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने दोनों आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
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