नई दिल्ली 8 जनवरी (दैनिक खबरनामा)वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का भारत और खासतौर पर दिल्ली से एक पुराना और दिलचस्प जुड़ाव रहा है। वर्ष 2015 में जब वे राष्ट्रपति के रूप में भारत आए थे, तो दिल्ली की सड़कों और माहौल ने उन्हें एक जानी-पहचानी अनुभूति कराई थी। इससे पहले वे 2005 में निजी दौरे पर और 2012 में वेनेजुएला के विदेश मंत्री के रूप में भी भारत आ चुके थे।इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अपने होटल की ओर जाते समय, जब उनका काफिला चाणक्यपुरी इलाके से गुजरा, तो सिमोन बोलिवर मार्ग देखकर उन्हें विशेष सुखद अनुभूति हुई। सिमोन बोलिवर वेनेजुएला के महान क्रांतिकारी नेता और राष्ट्रीय नायक माने जाते हैं।सिमोन बोलिवर एल लिबरटाडोर’ की विरासत
सिमोन बोलिवर (1783–1830) को ‘एल लिबरटाडोर’ यानी मुक्तिदाता कहा जाता है। उन्होंने स्पेनिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष कर वेनेजुएला, कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू और बोलिविया जैसे कई देशों को आजादी दिलाई। बोलिवर न केवल स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे, बल्कि वे लैटिन अमेरिकी एकता और साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा के भी प्रबल समर्थक रहे।दिल्ली में लैटिन अमेरिकी नेताओं की छापदिल्ली में सिर्फ सिमोन बोलिवर ही नहीं, बल्कि बेनिटो जुआरेज़ और जोस दे सैन मार्टिन जैसे अन्य प्रमुख लैटिन अमेरिकी नेताओं के नाम पर भी सड़कें मौजूद हैं। यह भारत और लैटिन अमेरिकी देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है।
JNU नहीं जा पाए मादुरोहालांकि, अपने कई दौरों के बावजूद निकोलस मादुरो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) नहीं जा सके, जबकि वे वहां की अकादमिक और वैचारिक परंपरा से परिचित रहे हैं। फिर भी, दिल्ली की गलियों, सड़कों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक माहौल ने उनके मन में भारत की एक गहरी छवि छोड़ी।