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दैनिक खबरनामा | 20 अगस्त | नई दिल्ली: देश में E20 पेट्रोल को लेकर इंजन की क्षमता, माइलेज और ईंधन की गुणवत्ता पर चर्चा के बीच सरकार अब समुद्री परिवहन को कम कार्बन वाला बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। भारतीय तटीय जलक्षेत्र में चलने वाले जहाजों के मरीन फ्यूल में बायोफ्यूल की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक चरणबद्ध रोडमैप तैयार किया गया है।

सरकार का लक्ष्य समुद्री जहाजों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाना और इंडियन कोस्टल ट्रेड में रिन्यूएबल तथा कम कार्बन वाले ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसी उद्देश्य से डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन (DGMA) ने ड्राफ्ट रोडमैप जारी किया है।

2028 से 10% तक ब्लेंडिंग को प्रोत्साहन

DGMA के दस्तावेज के अनुसार, बायोफ्यूल और उसके ब्लेंड का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने का अपेक्षाकृत सरल और लागत प्रभावी विकल्प हो सकता है। खास बात यह है कि ड्रॉप-इन बायोफ्यूल के इस्तेमाल के लिए मौजूदा जहाजों के फ्यूल सिस्टम में बड़े तकनीकी बदलाव की जरूरत नहीं पड़ सकती।

प्रस्ताव के तहत 1 जनवरी 2028 से इंडियन कोस्टल बिजनेस में संचालित जहाजों को MGO, VLSFO या FO जैसे मरीन फ्यूल के साथ अधिकतम 10% तक बायोफ्यूल ब्लेंड अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

हालांकि, बायोफ्यूल का इस्तेमाल फ्यूल की उपलब्धता, जहाज और इंजन की कम्पैटिबिलिटी, सुरक्षा आवश्यकताओं, निर्माता की सलाह और लागू कानूनी प्रावधानों के अधीन रहेगा।

2029 से 10% बायोफ्यूल जरूरी

ड्राफ्ट में सबसे अहम प्रावधान 1 जनवरी 2029 से लागू करने का प्रस्ताव है। इसके तहत दायरे में आने वाले इंडियन कोस्टल ट्रेड के प्रत्येक जहाज की प्रोपल्शन और ऑक्जिलरी मशीनरी में इस्तेमाल होने वाले मरीन फ्यूल में मात्रा के आधार पर कम से कम 10% बायोफ्यूल होना अनिवार्य किया जाएगा।

यह नियम मरीन गैस ऑयल (MGO), वेरी लो सल्फर फ्यूल ऑयल (VLSFO) और फ्यूल ऑयल (FO) का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर लागू करने का प्रस्ताव है। संबंधित रेजिडुअल मरीन फ्यूल ग्रेड भी इसके दायरे में रखे गए हैं।

जहाज मालिकों के साथ कई पक्ष होंगे जिम्मेदार

प्रस्ताव का प्रभाव केवल जहाज मालिकों तक सीमित नहीं होगा। शिप मैनेजर, ऑपरेटर, चार्टरर, मास्टर, बंकर सप्लायर, फ्यूल प्रोड्यूसर और ब्लेंडर समेत समुद्री ईंधन की खरीद, उत्पादन, ब्लेंडिंग, सप्लाई, बंकरिंग और इस्तेमाल से जुड़े अन्य पक्ष भी इसके दायरे में आएंगे।

इस व्यवस्था को लागू करने से पहले जहाज मालिकों, ऑपरेटरों और चार्टरर्स को बायोफ्यूल ब्लेंड की खरीद और उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ उसकी कम्पैटिबिलिटी और स्टेबिलिटी की जांच करनी होगी। इसके अलावा फ्यूल स्टोरेज एवं मैनेजमेंट, क्रू ट्रेनिंग तथा ईंधन की खपत और मशीनरी के प्रदर्शन की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित करनी होंगी।

सस्टेनेबल बायोफ्यूल के लिए तय होंगे मानक

DGMA के अनुसार, प्रस्तावित सस्टेनेबल बायोफ्यूल ऐसे निर्धारित मानकों वाले फीडस्टॉक से तैयार किया जाना चाहिए, जिसकी उत्पादन प्रक्रिया प्रमाणित हो। इसके स्रोत और ट्रेसिबिलिटी का रिकॉर्ड उपलब्ध होना जरूरी होगा। साथ ही पूरे लाइफ साइकिल के दौरान होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का भी हिसाब रखा जाएगा।

DGMA ने इस पहल को नेशनल मैरीटाइम डीकार्बोनाइजेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क (NMDPF), नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स 2018 और भारत के पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप बताया है।

चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाने वाले इस रोडमैप का उद्देश्य समुद्री परिवहन में बायोफ्यूल की खपत बढ़ाना, पारंपरिक मरीन फ्यूल पर निर्भरता कम करना और जहाजों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना है।

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