दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 3 जून : रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल आयात करने वाले भारत के लिए आने वाले समय में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिया है कि अमेरिका रूसी तेल खरीद पर दी गई प्रतिबंध छूट को लंबे समय तक जारी रखने के पक्ष में नहीं है और इसे समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के समक्ष सुनवाई के दौरान रुबियो ने कहा कि रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंध अमेरिकी नीति का हिस्सा है और मौजूदा छूट केवल अस्थायी व्यवस्था के रूप में दी गई थी। उनके अनुसार, इस छूट का उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखना था, लेकिन अमेरिका इसे जल्द समाप्त करना चाहता है।
मौजूदा छूट 17 जून को समाप्त होने वाली है। इसे पहली बार मार्च में लागू किया गया था और बाद में दो बार बढ़ाया गया। यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के बीच यह राहत दी गई थी।
पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने रियायती कीमतों पर कच्चे तेल की बिक्री बढ़ाई, जिसका सबसे बड़ा लाभ भारत को मिला। इससे भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को अपेक्षाकृत कम लागत पर पूरा करने में सफल रहा और घरेलू स्तर पर महंगाई के दबाव को नियंत्रित रखने में भी मदद मिली।
रुबियो ने स्वीकार किया कि रूसी तेल की आपूर्ति ने वैश्विक बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि अमेरिका का तर्क है कि तेल निर्यात से मिलने वाला राजस्व रूस को यूक्रेन युद्ध जारी रखने में आर्थिक सहायता प्रदान करता है। इसी कारण वाशिंगटन चाहता है कि भारत सहित प्रमुख आयातक देश धीरे-धीरे रूसी तेल पर निर्भरता कम करें।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा की थी। अमेरिका का आरोप था कि भारत रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से रूस की अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहा है। हालांकि बाद में दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौते के बाद इस प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क को वापस लेने का निर्णय लिया गया।
व्हाइट हाउस द्वारा जारी एक फैक्ट शीट में दावा किया गया था कि भारत ने रूसी तेल के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आयात को सीमित करने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि भारत सरकार ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी प्रतिबद्धता की पुष्टि नहीं की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी प्रशासन भविष्य में प्रतिबंधों को लेकर नरम रुख अपनाता है तो भारत को सस्ते रूसी तेल का लाभ मिलता रह सकता है। वहीं, यदि छूट समाप्त हो जाती है तो भारत को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से तेल आयात बढ़ाने जैसी वैकल्पिक रणनीतियों पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है। इससे वैश्विक तेल कीमतों और भारत के आयात बिल पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना है।