दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 9 जून : भारत में कैंसर के मरीजों को उपचार के लिए आवश्यक प्लैटिनम-आधारित दवाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। दवाओं की उपलब्धता घटने से मरीजों और उनके परिवारों को आवश्यक दवाएं प्राप्त करने के लिए लंबी मशक्कत करनी पड़ रही है, जबकि कई अस्पतालों, विशेषकर सरकारी अस्पतालों, में इन दवाओं का भंडार तेजी से कम हो रहा है।

बिहार के एक 52 वर्षीय बैंक कर्मचारी ने बताया कि उन्हें अपनी 70 वर्षीय मां के यकृत कैंसर के इलाज के लिए आवश्यक प्लैटिनम-आधारित कैंसररोधी दवा खोजने में एक सप्ताह से अधिक समय लग गया। उन्होंने दर्जनों औषधि विक्रेताओं और दवा दुकानों से संपर्क किया, लेकिन उन्हें आवश्यक मात्रा में दवा नहीं मिल सकी। अंततः उन्हें देश की राजधानी नई दिल्ली में दवा मिली, जिसे उन्होंने अपने गांव मंगवाया।

उन्होंने कहा, “मुझे आवश्यक मात्रा भी नहीं मिल सकी। अगली खुराक के लिए क्या करूंगा, यह मुझे नहीं पता।”

उनकी परेशानी भारत में प्लैटिनम-आधारित कैंसर रोधी दवाओं की बढ़ती कमी को दर्शाती है। इस संकट के कारण मरीजों को दवाओं की तलाश में जगह-जगह भटकना पड़ रहा है और अस्पतालों में भी इनकी उपलब्धता कम होती जा रही है।

चिकित्सकों और औषधि उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, भारत प्लैटिनम के आयात पर निर्भर है। दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ता देशों से आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में संघर्ष और वैश्विक बाजार में प्लैटिनम की कीमतों में तेजी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

दवा विक्रेताओं के संगठनों का कहना है कि पिछले दो महीनों से आपूर्ति संकट बना हुआ है, लेकिन पिछले दो सप्ताह में स्थिति और खराब हो गई है। दवा वितरक लगातार शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें ये दवाएं पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रही हैं।

भारत में अनेक दवा निर्माता कंपनियां प्लैटिनम-आधारित कीमोचिकित्सा दवाओं का उत्पादन करती हैं। इनमें बड़ी सामान्य औषधि निर्माता कंपनियों के साथ-साथ कैंसर उपचार में विशेषज्ञता रखने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।

चिकित्सकों और दवा वितरकों के अनुसार, सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन जैसी दवाओं की आपूर्ति हाल के सप्ताहों में काफी सीमित रही है। इन दवाओं का उपयोग फेफड़ों, अंडाशय, पित्ताशय तथा अन्य कई प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है।

हैदराबाद के एक दवा वितरक ने बताया, “मुझे प्रतिदिन लगभग दस फोन आते हैं, जिनमें मरीज या उनके परिजन सिस्प्लैटिन की व्यवस्था में मदद मांगते हैं।”

चिकित्सकों का अनुमान है कि भारत में कीमोचिकित्सा प्राप्त करने वाले कम से कम एक-चौथाई मरीजों को प्लैटिनम-आधारित दवाएं दी जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये दवाएं कैंसर उपचार की रीढ़ हैं और इनके बिना उपचार जारी रखना बेहद कठिन हो सकता है।

वैश्विक बाजार में प्लैटिनम की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। इसका प्रमुख कारण लगातार चौथे वर्ष मांग और आपूर्ति के बीच अनुमानित कमी, खदानों से सीमित उत्पादन, निवेश की मजबूत मांग तथा उपलब्ध भंडार में गिरावट है। इसके अतिरिक्त मोटर वाहन उद्योग में पैलेडियम के स्थान पर प्लैटिनम के बढ़ते उपयोग ने भी मांग बढ़ाई है।

दवा निर्माता कंपनियां बढ़ती लागत का भार मरीजों पर नहीं डाल पा रही हैं क्योंकि सरकार इन दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित करती है। हालांकि कंपनियों ने मूल्य सीमा में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि की मांग की है।

सरकार के औषधि विभाग ने इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

बढ़ती लागत और कच्चे माल की कमी के कारण कुछ कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया है। प्लैटिनम-आधारित कच्चे पदार्थ की उपलब्धता में कठिनाई के चलते कुछ निर्माताओं ने सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन का उत्पादन अस्थायी रूप से रोक दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो देशभर में कैंसर मरीजों के उपचार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है और हजारों मरीजों को समय पर आवश्यक दवाएं नहीं मिल पाएंगी।

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