दैनिक खबरनामा ब्यूरो। ह्यूस्टन, 11 जून : कभी अरब देशों के तेल प्रतिबंध का सामना करने वाला अमेरिका अब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बन गया है। दशकों तक वैश्विक तेल बाजार पर सऊदी अरब और रूस का दबदबा रहा, लेकिन अब अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों ने शीर्ष स्थान हासिल कर लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ जारी युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आए बदलावों ने अमेरिका की स्थिति को और मजबूत किया है।
1973 में कुछ ओपेक (OPEC) देशों ने इज़राइल के समर्थन के विरोध में अमेरिका पर तेल प्रतिबंध लगाया था। उस समय अमेरिका मध्य पूर्व के तेल पर काफी हद तक निर्भर था। हालांकि, वर्ष 2010 के बाद अमेरिकी शेल (Shale) तेल और गैस उत्पादन में तेज वृद्धि ने स्थिति पूरी तरह बदल दी। पहले अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक बना और बाद में तेल उत्पादन में भी शीर्ष पर पहुंच गया।
वर्ष 2026 में ईरान के साथ संघर्ष के कारण सऊदी अरब के तेल निर्यात में बाधा आई, जबकि रूस के तेल निर्यात पर यूक्रेनी ड्रोन हमलों और अमेरिकी प्रतिबंधों का असर पड़ा। इस बीच अमेरिका ने उत्पादन बढ़ाते हुए वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
जहाज ट्रैकिंग कंपनी वॉर्टेक्सा (Vortexa) के आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में अमेरिका का कच्चे तेल और ईंधन का निर्यात बढ़कर लगभग 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। इसके साथ ही अमेरिका लगातार तीसरे महीने दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बना रहा। तुलना में रूस का निर्यात लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन और सऊदी अरब का निर्यात करीब 59 लाख बैरल प्रतिदिन रहा।
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी प्रभुत्व से तेल बाजार में ओपेक और उसके सहयोगी देशों की पारंपरिक मूल्य निर्धारण शक्ति कमजोर पड़ सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से ओपेक पर बाजार में हेरफेर करने के आरोप लगाते रहे हैं। इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात के संगठन छोड़ने से भी ओपेक को झटका लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक का दर्जा अमेरिका को सैन्य और वित्तीय ताकत के अलावा एक नया रणनीतिक हथियार भी देता है। ऊर्जा निर्यात के माध्यम से वाशिंगटन अपने सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी देशों पर अधिक प्रभाव डाल सकता है।
यूरोप और एशिया दोनों ही क्षेत्रों में अमेरिकी तेल की मांग तेजी से बढ़ी है। इस वर्ष अब तक यूरोप ने अमेरिकी तेल निर्यात का लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा खरीदा है, जबकि एशिया की हिस्सेदारी मई में बढ़कर 46 प्रतिशत तक पहुंच गई। इससे स्पष्ट है कि कई देश अब मध्य पूर्व के बजाय अमेरिकी ऊर्जा आपूर्ति पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार अमेरिकी तेल उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां उत्पादन सरकारी निर्देशों के बजाय निजी कंपनियों के व्यावसायिक निर्णयों पर आधारित होता है। तेल की कीमतें बढ़ने पर कंपनियां उत्पादन बढ़ाती हैं और कीमतें घटने पर उत्पादन कम कर देती हैं। यही बाजार-आधारित व्यवस्था अमेरिका को वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई ताकत प्रदान कर रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 15 वर्षों में वैश्विक तेल मांग में हुई वृद्धि का बड़ा हिस्सा अमेरिकी तेल उत्पादन में उछाल के कारण पूरा हो सका है। इससे अमेरिका न केवल ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना है, बल्कि अब वैश्विक तेल व्यापार का सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी भी बन चुका है।