टाटा-चेरी समझौते ने दिखाया नया रास्ता, EV सेक्टर में बढ़ रहा भारत-चीन सहयोग

दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 24 जून : भारत ने भले ही राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक कारणों से चीनी वाहन कंपनियों की सीधी एंट्री पर कड़े प्रतिबंध लगाए हों, लेकिन चीन की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) तकनीक भारतीय बाजार में धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार भारत में चीनी कंपनियों की तकनीकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही है।

हाल ही में टाटा मोटर्स ने घोषणा की कि वह अपनी नई प्रीमियम इलेक्ट्रिक कारों के निर्माण के लिए चीन की वाहन निर्माता कंपनी चेरी के प्लेटफॉर्म का उपयोग करेगी। हालांकि दोनों कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल आपूर्ति संबंधी समझौता है और इसमें तकनीक हस्तांतरण या इक्विटी भागीदारी शामिल नहीं है।

2020 के बाद बढ़ी थी सख्ती

भारत और चीन के बीच वर्ष 2020 में सीमा पर हुए सैन्य संघर्ष के बाद नई दिल्ली ने चीनी निवेश और कंपनियों की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी थी। इसके बाद कई चीनी कंपनियों की भारत में विस्तार योजनाएं प्रभावित हुईं।

हालांकि हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार के प्रयास किए गए हैं, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में सतर्कता अब भी बनी हुई है।

कानूनी विशेषज्ञ संतोष पई का कहना है कि यदि भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो किसी न किसी स्तर पर चीन के साथ औद्योगिक सहयोग आवश्यक होगा। वहीं चीनी कंपनियों के लिए भी भारत जैसे विशाल बाजार को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

टाटा को मिलेगा तेजी से विस्तार का मौका

विशेषज्ञों के अनुसार, चेरी के प्लेटफॉर्म का उपयोग करके टाटा मोटर्स अपनी नई इलेक्ट्रिक कारों को कम समय में बाजार में उतार सकेगी। कंपनी की योजना भविष्य में चीन से आयातित किटों पर निर्भरता कम करके स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक पुर्जों का निर्माण करने की है।

सरकारी सूत्रों का मानना है कि ऐसे समझौते, जो अंततः भारत में स्थानीय विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करें, देश के औद्योगिक विकास के लिए सकारात्मक साबित हो सकते हैं।

भारतीय EV बाजार पर चीन की नजर

चीन की इलेक्ट्रिक वाहन इंडस्ट्री दुनिया की सबसे उन्नत और प्रतिस्पर्धी उद्योगों में गिनी जाती है। घरेलू बाजार में मांग में सुस्ती और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का सामना कर रही चीनी कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि भले ही चीनी वाहन कंपनियों को भारत में सीधे कारोबार की अनुमति नहीं मिल रही हो, लेकिन तकनीकी साझेदारी और आपूर्ति समझौतों के जरिए वे भारतीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं।

चीन के ऑटो उद्योग विशेषज्ञ गाओ हुआ के अनुसार, भारतीय बाजार में जगह बनाना चीनी कंपनियों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यदि चीनी कंपनियां पीछे हटती हैं तो अन्य देशों की कंपनियां उस अवसर का लाभ उठा लेंगी।

जापानी और यूरोपीय कंपनियों के लिए बढ़ी चुनौती

भारत के ऑटोमोबाइल और ईवी सेक्टर में लंबे समय से जापानी, दक्षिण कोरियाई और यूरोपीय कंपनियों का दबदबा रहा है। लेकिन अब चीनी तकनीक आधारित साझेदारियां इस स्थिति को चुनौती देने लगी हैं।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी तकनीक अपेक्षाकृत कम लागत वाली और तेजी से लागू की जा सकने वाली है, जिससे भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धात्मक लाभ हासिल कर सकती हैं।

इसी दिशा में भारतीय ऑटो कंपोनेंट निर्माता यूनो मिंडा ने चीन की इनोवेंस के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित किया है, जो भारत में इलेक्ट्रिक वाहन पावरट्रेन का निर्माण कर रहा है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां पारंपरिक रूप से यूरोपीय कंपनियों का दबदबा रहा है।

बदल रहा है भारत का EV परिदृश्य

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में शामिल होगा। ऐसे में तकनीकी सहयोग, स्थानीय विनिर्माण और वैश्विक साझेदारियां इस क्षेत्र की दिशा तय करेंगी।

हालांकि भारत सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए चीनी कंपनियों के प्रति सतर्क रुख बनाए हुए है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में चीनी तकनीक की बढ़ती मौजूदगी यह संकेत देती है कि दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग के नए मॉडल विकसित हो रहे हैं।

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