दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 28 जुलाई: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के क्रियान्वयन में देरी को लेकर पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन को सख्त लहजे में फटकार लगाई है।
अदालत ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 को लागू हुए करीब आठ साल हो चुके हैं, बावजूद इसके कई अहम प्रावधान आज तक धरातल पर नहीं उतर सके हैं। इसे कोर्ट ने गंभीर मसला करार दिया।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए तीनों राज्यों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत हलफनामा सौंपने के आदेश दिए। खंडपीठ ने कहा कि हलफनामे में यह बताया जाए कि पहले दिए गए निर्देशों पर कितना अमल हुआ है और अधिनियम को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान बताया गया कि हरियाणा सरकार ने भले ही अधिनियम के तहत नियम बना लिए हैं, लेकिन अभी तक राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड का गठन नहीं किया गया है। इसके अलावा कानून के तहत जरूरी अन्य इंतजाम भी पूरे नहीं हुए हैं। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सिर्फ नियम बना देना काफी नहीं है, कानून का असल में पालन होना भी जरूरी है। पंजाब सरकार ने हलफनामा दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का वक्त मांगा।
अदालत ने टिप्पणी की कि यह कानून समाज के उस तबके की हिफाजत और अधिकारों के लिए बना है जो खुद अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकता। इसलिए राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे इसके हर प्रावधान को तय समय में लागू करें।
खंडपीठ ने चंडीगढ़ प्रशासन के मुख्य सचिव को भी निर्देश दिया कि वे अपने हलफनामे में स्पष्ट करें कि मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और समीक्षा बोर्ड बना है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।