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संघर्ष के दौरान सरकार और सेना के साथ मजबूती से खड़ा होना जरूरी, लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए

दैनिक खबरनामा। मुंबई, 8 अगस्त : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत-पाकिस्तान संबंधों और मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच संवाद और सामंजस्य को समाधान का महत्वपूर्ण रास्ता बताया है। मुंबई में ‘इंडियाज़ इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइटेड नेशंस’ की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण में किसी विवाद का समाधान दूसरे पक्ष को हराना या समाप्त करना नहीं, बल्कि बातचीत के जरिए सामंजस्य स्थापित करना है।

‘पाकिस्तान के आम नागरिक भारतीयों के स्वाभाविक दुश्मन नहीं’

Gen Z के साथ संवाद के दौरान भारत के पड़ोसी देशों के साथ तनाव को लेकर पूछे गए सवाल पर भागवत ने कहा कि पाकिस्तान के आम नागरिकों को भारतीयों का जन्मजात या स्वाभाविक शत्रु मानना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि किसी देश या समाज के साथ अनिश्चितकाल तक दुश्मनी बनाए रखना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। राजनीतिक परिस्थितियां और राज्य व्यवस्था अलग विषय हैं, लेकिन आम लोगों के बीच संबंधों और मानवीय दृष्टिकोण को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

संघर्ष के समय सरकार और सेना के साथ खड़ा होना जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि जब देश युद्ध या गंभीर संघर्ष की स्थिति में हो, तब नागरिकों का दायित्व है कि वे सरकार और सेना के निर्णयों के साथ मजबूती से खड़े रहें।

उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कारणों से कुछ संपर्क या संबंध अस्थायी रूप से सीमित किए जा सकते हैं। हालांकि, संघर्ष समाप्त होने के बाद संवाद और रिश्तों की संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

‘लड़ाई खत्म हो तो वहीं से शुरू हो बातचीत’

RSS प्रमुख ने कहा कि किसी संघर्ष के समाप्त होने के बाद बातचीत को उसी बिंदु से आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जहां संवाद रुका था।

उनके मुताबिक, लंबे समय तक नफरत और दुश्मनी बनाए रखना किसी विवाद को खत्म करने का रास्ता नहीं है। संघर्ष परिस्थितियों का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसे स्थायी संबंधों का आधार नहीं बनाया जा सकता।

साझा इतिहास का भी किया जिक्र

भारत-पाकिस्तान संबंधों का उल्लेख करते हुए भागवत ने दोनों देशों के साझा इतिहास की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान करीब 100 साल पहले तक भारत का हिस्सा था।

उन्होंने भारत और चीन के ऐतिहासिक संबंधों का भी जिक्र किया और कहा कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक और सभ्यतागत संपर्क रहे हैं।

भागवत का कहना था कि राजनीतिक सीमाएं और मौजूदा परिस्थितियां अपनी जगह हैं, लेकिन इनके आधार पर लोगों के बीच संबंधों और मानवता के व्यापक दृष्टिकोण को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।

पहलगाम हमले के बाद बढ़ा था भारत-पाक तनाव

भागवत का यह बयान भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के तनाव की पृष्ठभूमि में आया है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव काफी बढ़ गया था।

इसके बाद भारत ने मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत सैन्य कार्रवाई की थी। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई दिनों तक सैन्य तनाव बना रहा। बाद में संघर्ष विराम हुआ।

निष्कर्ष

मोहन भागवत के बयान का केंद्रीय संदेश यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर संघर्ष के दौरान सरकार और सेना के साथ खड़ा होना जरूरी है, लेकिन संघर्ष खत्म होने के बाद संवाद के रास्ते खुले रखने चाहिए। भारत-पाक रिश्तों के संदर्भ में उनका यह दृष्टिकोण स्थायी दुश्मनी के बजाय दीर्घकालिक शांति और सामंजस्य पर जोर देता है।

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