दैनिक खबरनामा | 10 अगस्त | बीजिंग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच चीन ने निगरानी तकनीक को पानी के भीतर तक पहुंचा दिया है। तिब्बत की सबसे बड़ी नदी यारलुंग त्सांगपो में अब AI तकनीक के जरिए मछलियों की पहचान और उनकी आवाजाही पर लगातार नजर रखी जा रही है। नदी पर बने एक बड़े बांध के पास मछलियों के लिए बनाए गए विशेष मार्ग यानी ‘फिशवे’ पर यह सिस्टम चौबीसों घंटे सक्रिय रहता है।
चीन की इस तकनीक ने जहां पर्यावरण विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है, वहीं भारत के लिए भी यह परियोजना रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इंसानी निगरानी की जगह AI ने संभाला काम
साउथ चाइना मॉर्निग पोस्ट और ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन यारलुंग त्सांगपो नदी पर स्थित बांध के फिशवे से गुजरने वाली मछलियों की विभिन्न प्रजातियों की पहचान और निगरानी के लिए AI आधारित सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है।
पहले मछलियों की पहचान और उनके आवागमन का रिकॉर्ड रखने का काम कर्मचारियों को मैनुअली करना पड़ता था। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होने के साथ-साथ काफी कठिन भी थी। अब ‘फिश फेशियल रिकग्निशन’ तकनीक के जरिए कैमरों और AI सिस्टम की मदद से गुजरने वाली मछलियों को पहचाना और ट्रैक किया जा रहा है।
वर्ष 2015 में यारलुंग त्सांगपो नदी पर 116 मीटर ऊंचा जंगमू हाइड्रोपावर स्टेशन शुरू किया गया था। यहां मछलियों को नदी के बहाव के विपरीत दिशा में जाने में मदद करने के लिए फिश लैडर बनाया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस व्यवस्था के जरिए अब तक करीब 5,70,000 दुर्लभ मछलियों को ऊपर की ओर प्रवास करने में मदद मिली है।
AI सिस्टम का मुख्य काम यह पता लगाना है कि फिशवे से कौन-कौन सी प्रजातियां गुजर रही हैं और उनकी आवाजाही किस दिशा में हो रही है।
चीन का दावा- मछलियों की संख्या स्थिर, इकोसिस्टम में सुधार
इस निगरानी परियोजना को लेकर बांध के सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण निदेशक यांग शियाओचेंग का कहना है कि हाइड्रोपावर स्टेशन के निर्माण के बाद मछलियों की आबादी में गिरावट नहीं आई है। उनके अनुसार, मछलियों की संख्या पूरी तरह स्थिर बनी हुई है।
यांग शियाओचेंग ने यह भी दावा किया कि नदी की इस घाटी में जलीय इकोसिस्टम और अन्य जीव-जंतुओं के विकास की स्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।
हालांकि, इन दावों पर विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों के मुताबिक, बड़े बांध मछलियों के प्राकृतिक प्रवास में बाधा पैदा कर सकते हैं। मछलियों को भोजन और प्रजनन के लिए अपने प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है, जिसका असर उनकी प्रजनन क्षमता पर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यारलुंग त्सांगपो?
चीन की यह परियोजना भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यारलुंग त्सांगपो तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। भारत में इसे सियांग नदी के नाम से जाना जाता है। आगे यही नदी असम में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र का रूप लेती है।
ब्रह्मपुत्र भारत में करोड़ों लोगों के लिए पानी का एक प्रमुख स्रोत है। ऐसे में नदी के ऊपरी हिस्से में चीन की ओर से किए जा रहे बड़े बांधों और अन्य गतिविधियों पर भारत की नजर बनी हुई है।
भारतीय अधिकारियों और पर्यावरण विशेषज्ञों को आशंका है कि यारलुंग त्सांगपो के ऊपरी हिस्से में बड़े पैमाने पर बांध निर्माण से नदी के प्राकृतिक प्रवाह और तलछट यानी sediment के आवागमन में बदलाव आ सकता है।
इसका असर भारत में नदी के निचले क्षेत्रों के पर्यावरण पर पड़ने के साथ-साथ बाढ़ के स्वरूप में भी बदलाव के रूप में सामने आ सकता है। यही वजह है कि चीन की नदी परियोजनाओं और उनसे जुड़ी गतिविधियां भारत के लिए पर्यावरणीय और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से अहम बनी हुई हैं।