पंजाब 12 जनवरी( दैनिक खबरनामा )पंजाब, जिसे लंबे समय से देश का गेहूं-धान का कटोरा कहा जाता है, अब खेती में बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। बठिंडा, मालेरकोटला, मानसा और मुक्तसर जैसे जिलों में प्रगतिशील किसान परंपरागत, पानी की भारी खपत वाली फसलों से हटकर अब बेर (इंडियन जूजूब) की खेती को अपनाकर बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।कभी खेतों की मेड़ पर अपने-आप उगने वाला और “गरीबों का फल” कहलाने वाला बेर अब व्यावसायिक फसल के रूप में उभर रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बहुत कम पानी, कम खाद और न्यूनतम देखभाल की जरूरत होती है, जबकि आमदनी गेहूं-धान की तुलना में कहीं बेहतर होती है।पहले ही साल फल, दस साल तक उत्पादन
किसान अब उमरान और एप्पल क्रॉस जैसी उन्नत किस्मों की खेती कर रहे हैं। बेर के पौधे फरवरी-मार्च या जुलाई-अगस्त में लगाए जाते हैं और खास बात यह है कि पौधे पहले ही साल फल देना शुरू कर देते हैं। एक बार तैयार होने के बाद यह फसल 10 साल से अधिक समय तक लगातार उत्पादन देती है।दिसंबर से अप्रैल तक होती है तुड़ाईबेर की तुड़ाई दिसंबर से अप्रैल तक चलती है, जिससे किसानों को लंबे समय तक बाजार से जुड़ाव और नियमित आमदनी मिलती है। बदलते मौसम और गिरते भूजल स्तर के दौर में यह फसल जलवायु-अनुकूल और पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प मानी जा रही है।फसल विविधीकरण की दिशा में बड़ा कदम विशेषज्ञों का मानना है कि बेर की खेती पंजाब के लिए फसल विविधीकरण का मजबूत मॉडल बन सकती है। इससे न सिर्फ किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि राज्य में पानी के संकट से निपटने में भी मदद मिलेगी।पंजाब का किसान अब यह साबित कर रहा है कि अगर सोच बदली जाए, तो “गरीबों का फल” भी समृद्धि का रास्ता बन सकता है।